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छठ का पर्व, झाग का दुख — भक्तों ने दिया अर्घ्य, सरकार ने दिया धोखा!”

नई दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली मां यमुना नदी  एक बार फिर आस्था और स्वार्थ भरी राजनीति दोनों का शिकार बनी हुई है। जब लाखों की संख्या में व्रती महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य देने और अपनी सदियों पुरानी आस्था को पूरा करने के लिए नदी के तटों पर पहुंचीं, तो उन्हें यमुना का पानी पवित्र और निर्मल नहीं, सफेद, जहरीले और रासायनिक झाग से भरा हुआ मिला। इस झाग ने न केवल यमुना के पानी को अपवित्र किया, सरकारों—चाहे वह केंद्र  सरकार हो या दिल्ली सरकार—के यमुना की सफाई पर किए गए सभी झूठे वादों और दावों की कलई खोलकर रख दी। कागज़ों और राजनीतिक विज्ञापनों में यह नदी बेशक चमक रही हो, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अत्यंत निराशाजनक है: आस्था की इस सबसे पवित्र घड़ी में भी श्रद्धालु अपने शरीर और अपनी अटूट धार्मिक विश्वास दोनों को प्रदूषण और ज़हर में डुबोने के लिए मजबूर हैं, जो राजनीतिक इच्छाशक्ति की घोर कमी और प्रशासनिक विफलता का स्पष्ट प्रमाण है।

छठ पर्व की संध्या: आस्था झाग में डूबी, प्रशासन कैमरे ढूंढता रहा 

छठ महापर्व भारतीय संस्कृति और सभ्यता की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है, जो प्रकृति, सूर्य और जल जैसे जीवनदायी तत्वों की पूजा पर आधारित है, लेकिन इस वर्ष का यह पर्व दिल्ली के इतिहास में शर्म और उपहास का एक नया अध्याय जोड़ गया। जब आस्थावान व्रती महिलाएं यमुना के घाटों पर पहुंचीं, तो उन्हें उम्मीद थी कि वहां गंगाजल का पवित्र प्रवाह मिलेगा या जीवनदायिनी यमुना का शुद्ध कलकल स्वर सुनाई देगा, लेकिन इसके बजाय उन्हें चारों ओर सिर्फ विषैला, औद्योगिक और रासायनिक फोम तैरता हुआ मिला, जिसने पूरे नदी तट को सफेद चादर की तरह ढक लिया था।
यह झाग केवल फैक्ट्रियों और औद्योगिक कचरे के सीधे बहाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निकम्मेपन और घोर उपेक्षा का भी एक ज्वलंत प्रतीक है। सबसे दुखद और निंदनीय बात यह है कि प्रशासन को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी कि भक्त इस जहरीले और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक पानी में उतर रहे हैं; उनकी पूरी चिंता केवल इतनी थी कि इस शर्मनाक स्थिति की तस्वीरें कैसी दिखेंगी।

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 कालिंदी कुंज और अन्य प्रमुख घाटों पर इस झाग को मीडिया और जनता की नज़रों से छिपाने के लिए प्लास्टिक नेटों और कृत्रिम पर्दों का इस्तेमाल किया गया ताकि कैमरों में एक झूठी ‘सफाई’ का भ्रम उत्पन्न किया जा सके। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि यह वह दौर है जहां झूठ को चमकाकर और सजाकर सच्चाई और वास्तविक ज़मीनी हकीकत को पूरी तरह से डुबो दिया गया है।

अरबों का बजट, शून्य सफाई — यमुना के नाम पर केवल राजनीतिक धोखा 

पिछले एक दशक के दौरान, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार दोनों ने ही यमुना नदी की सफाई और कायाकल्प के नाम पर अरबों रुपये खर्च करने के बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन परिणाम सबके सामने हैं। केंद्र की महत्वाकांक्षी “नमामि गंगे” परियोजना की तर्ज़ पर दिल्ली में “यमुना एक्शन प्लान” के कई चरण घोषित किए गए और विशाल धनराशि आवंटित की गई, लेकिन नदी की ज़मीनी हालत यह है कि दिल्ली में यमुना आज अपने इतिहास में पहले से कहीं ज़्यादा प्रदूषित हो चुकी है। 

दिल्ली जल बोर्ड और केन्द्रीय जलशक्ति मंत्रालय हर साल नियमित रूप से ऐसे सरकारी आंकड़े जारी करते हैं जिनमें यह दावा किया जाता है कि यमुना का पानी अब पहले से ‘स्वच्छ’ है और इसकी गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन नदी की वास्तविक स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो नदी का घुलित ऑक्सीजन स्तर (DO) लगभग शून्य पर पहुंच चुका है, और अमोनिया तथा फॉस्फेट जैसे जहरीले रासायनिक तत्वों का स्तर खतरनाक रूप से कई गुना बढ़ चुका है। 

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ये वही जहरीले तत्व हैं जो पानी में मिलकर रासायनिक झाग का निर्माण करते हैं—यह झाग न केवल श्रद्धालुओं की त्वचा और आंखों को जलाता है, बल्कि सांस के ज़रिए शरीर में प्रवेश कर उन्हें गंभीर बीमारियाँ भी दे सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अब ‘सफाई’ के बजाय केवल ‘कवर-अप ऑपरेशन’ किए जा रहे हैं; कुछ ही दिन पहले दिल्ली सरकार ने यह अविश्वसनीय दावा किया था कि “यमुना में अब स्नान के लायक पानी बह रहा है,” लेकिन उसी समय प्रसारित तस्वीरों में श्रद्धालु सिर से पांव तक जहरीले झाग में ढंके हुए दिखाई दिए। यही आज की राजनीति की कड़वी असलियत है—सत्य दबा हुआ है, और झूठ का झाग ऊपरी सतह पर तैर रहा है।

आस्था का अपमान, श्रद्धा का उपहास और सरकारों की आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति 

छठ पूजा के दौरान व्रती महिलाएं और श्रद्धालु जब “सूर्य नमस्कार” करने और अर्घ्य देने के लिए मां यमुना के जहरीले जल में खड़े हुए, तो उनके चेहरों पर भक्ति का संतोष नहीं, बल्कि गहरी निराशा और चिंता की रेखाएं स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। कई जगहों पर महिलाएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर, सिर्फ अपनी अटूट परंपरा और गहरे विश्वास को निभाने के लिए, इस विषैले पानी में उतरने के लिए मजबूर थीं। लेकिन इस आस्था और विश्वास के साथ जो उपहास किया गया है, वह भारतीय आस्था का सबसे बड़ा अपमान है।

दिल्ली के प्रमुख घाटों—कालिंदी कुंज, आईटीओ, मयूर विहार, वजीराबाद और ओखला—पर आज भी जहरीले झाग के बीच ही पूजा-अर्चना संपन्न हो रही है। कई श्रद्धालुओं ने भावुक होकर कहा, “हम तो मां की गोद में खड़े हैं, अब चाहे यह पानी ज़हर ही क्यों न हो।” लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारें इस गहन भक्ति और मजबूरी को देखकर भी नहीं जागीं? क्या आस्था अब केवल राजनीतिक दिखावे और प्रचार की एक सस्ती चीज़ बनकर रह गई है?

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मां यमुना को झाग से नहीं, ईमानदार शासन से मुक्ति चाहिए 

आज की यह स्थिति स्पष्ट करती है कि मां यमुना को अब केवल अस्थायी और दिखावटी ‘सफाई’ अभियानों की नहीं, बल्कि ईमानदार और जवाबदेह शासन की सख्त ज़रूरत है। यह नदी तब तक अपने प्रदूषण से मुक्त नहीं हो सकती जब तक उसकी सफाई और कायाकल्प का ठेका केवल खोखले राजनीतिक भाषणों और झूठे विज्ञापनों में ही चलता रहेगा। 

दिल्ली और केंद्र, दोनों ही जगह बीजेपी सरकार है और दोनों ही को अब यह मूलभूत बात समझनी होगी कि देश की जनता की आस्था को जानबूझकर जहर में डुबोकर, वे अपनी सत्ता और अपनी राजनीतिक साख को लंबे समय तक नहीं बचा सकते। यमुना नदी की करुण पुकार पूरे देश के लिए एक नैतिक और पर्यावरणीय चेतावनी है — “मेरे आंचल में झाग नहीं, झूठ भरा है। मुझे दिखावटी सफाई नहीं, वास्तविक सच्चाई चाहिए।” जब भक्त इस जहरीले झाग में अपने शरीर को डुबोकर भी पूजा-अर्चना करते हैं, तो यह उनकी अटूट भक्ति की ताकत का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह शासन की घोर लापरवाही और सार्वजनिक शर्म का सबसे बड़ा सबूत है। और अगर हमारी सरकारें इस शर्म को भी महसूस करने में पूरी तरह से विफल रहती हैं, तो यह समझ लेना चाहिए कि मर मां यमुना नहीं रही है, मर रहा है हमारे समाज और शासन का सामूहिक विवेक और नैतिक दायित्व।

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