नागपुर में इतिहास — आरएसएस के दरवाजे पर पहली बार उठा विरोध का परचम
देश के इतिहास में पहली बार नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुख्यालय के ठीक सामने एक ऐसा मोर्चा निकाला गया जिसने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। इस मोर्चे का आयोजन किया वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) ने, जो फुले, शाहू और डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा पर चलने वाला एक संगठन है। इस जनआक्रोश मोर्चे ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया क्योंकि पहली बार किसी संगठन ने सीधे आरएसएस के घर तक जाकर सामाजिक न्याय, समानता और संविधान की विचारधारा की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद की। नागपुर की सड़कों पर हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने इस विरोध को सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण का प्रतीक बना दिया।
फुले, शाहू, अंबेडकर की विचारधारा पर चलने वाले बहुजनों की गर्जना — “देश चलेगा संविधान से, मनुवाद से नहीं!”
वंचित बहुजन आघाड़ी ने इस प्रदर्शन के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया कि भारत का भविष्य उन विचारों से तय होगा जिन्होंने समाज के हर वंचित, शोषित और उपेक्षित व्यक्ति को सम्मान और अधिकार दिलाने का काम किया। संगठन के नेताओं ने कहा कि यह देश फुले, शाहू और अंबेडकर की विचारधारा पर चलेगा, मनुवादी सोच पर नहीं। उनका यह संदेश सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का आह्वान था। मोर्चे में शामिल युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने अपने हाथों में संविधान और तिरंगा लेकर यह वचन लिया कि वे मनुवादी व्यवस्था को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
पुलिस और प्रशासन ने रोकने की भरपूर कोशिश की, लेकिन बहुजन इरादे नहीं झुके
वंचित बहुजन आघाड़ी के इस मोर्चे को रोकने के लिए प्रशासन और पुलिस ने हर संभव प्रयास किया। जगह-जगह सुरक्षा बढ़ाई गई, आरएसएस मुख्यालय के आसपास बैरिकेड्स लगाए गए और कई बार प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका गया। लेकिन भीमवादी कार्यकर्ताओं का जोश और दृढ़ संकल्प प्रशासन की हर कोशिश पर भारी पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण लेकिन सशक्त तरीके से अपना प्रदर्शन जारी रखा और यह दिखा दिया कि लोकतंत्र में विचार की ताकत किसी भी सत्ता या संगठन से बड़ी होती है। आयोजकों ने कहा कि यह मोर्चा किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ था जो समानता और बंधुत्व के मूल्यों को कमजोर करती है।
RSS ने तिरंगा और संविधान स्वीकारने से किया इनकार — VBA नेताओं ने जताई नाराज़गी
वंचित बहुजन आघाड़ी के नेताओं ने एक गंभीर आरोप लगाया कि जब वे आरएसएस मुख्यालय पहुंचे तो संगठन के प्रतिनिधियों ने उनसे भारत का तिरंगा और संविधान की प्रति स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यह घटना प्रदर्शनकारियों के लिए गहरी निराशा और आक्रोश का कारण बनी। वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख ने कहा, “हम संविधान और तिरंगा लेकर शांति और समानता का संदेश देने पहुंचे थे, लेकिन RSS ने इसे ठुकरा दिया। यह न केवल हमारे विरोध का अपमान है, बल्कि संविधान और राष्ट्र के प्रतीकों का भी अनादर है।” नेताओं ने यह दोहराया कि “हमारा देश संविधान से चलेगा, मनुवाद से नहीं।” यह वाक्य वहाँ उपस्थित हजारों लोगों की सामूहिक भावना का प्रतीक बन गया।
दूसरी पार्टियों में वह हिम्मत नहीं जो वंचित बहुजन आघाड़ी ने दिखाई” — VBA का सवाल
मोर्चे के अंत में वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख नेता ने देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों पर तीखा सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “हम हर पार्टी से पूछते हैं — जो काम वंचित बहुजन आघाड़ी ने कर दिखाया, वह आप इतने सालों में क्यों नहीं कर सके?” यह सवाल न केवल एक चुनौती थी, बल्कि उस राजनीतिक निष्क्रियता पर भी प्रहार था जिसने सामाजिक न्याय के मुद्दे को केवल भाषणों तक सीमित रखा। VBA के कार्यकर्ताओं का कहना था कि अब यह सवाल हर गली, हर मोहल्ले, और हर राजनीतिक मंच से गूंजेगा — “जब हम कर सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं?”
नागपुर की गलियों में गूंजे नारे — “जय फुले, जय शाहू, जय भीम, जय संविधान”
मोर्चे के दौरान नागपुर की गलियां और आरएसएस मुख्यालय का इलाका “आरएसएस मुर्दाबाद, मनुवाद मुर्दाबाद” और “जय फुले, जय शाहू, जय भीम, जय संविधान” जैसे नारों से गूंज उठा। हर तरफ नीले झंडे, संविधान की प्रतियां और सामाजिक न्याय के नारों ने माहौल को भावनात्मक और ऐतिहासिक बना दिया। कई लोग इसे 21वीं सदी के नए सामाजिक आंदोलन की शुरुआत बता रहे हैं। बहुजन युवाओं में जोश था, महिलाओं में गर्व की भावना थी, और बुजुर्गों की आँखों में उस दिन का सपना चमक रहा था जब समानता का भारत पूरी तरह साकार होगा।
इतिहास में दर्ज होगा यह दिन — जब मनुवाद के सामने बहुजन चेतना ने दी सीधी चुनौती
वंचित बहुजन आघाड़ी का यह मोर्चा केवल विरोध का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय के प्रति एक वैचारिक प्रतिबद्धता की घोषणा थी। यह दिन इतिहास में दर्ज रहेगा जब फुले, शाहू और अंबेडकर की शिक्षाओं को मानने वाले लोग आरएसएस मुख्यालय के सामने संविधान और तिरंगे के साथ डटे रहे। इस प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया कि अब वंचितों, दलितों और पिछड़ों की आवाज़ सिर्फ सुनाई नहीं देगी — वह देश की दिशा तय करेगी। यह एक नए भारत की नींव का संकेत है, जहाँ मनुवाद की जगह संविधान का राज होगा। नारे जो इतिहास में दर्ज रहेंगे:
“आरएसएस मुर्दाबाद! मनुवाद मुर्दाबाद!” “जय फुले! जय शाहू! जय भीम! जय संविधान! जय भारत!”




