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वोट जनता का, नतीजा सिस्टम का : तंत्र ने घोंट दिया लोकतंत्र का गला

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भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे संकटपूर्ण चौराहे पर खड़ा है, जहाँ जनता की आवाज़ और उसकी इच्छाशक्ति गौण होती जा रही है, और “सिस्टम” की चालाकी, धनबल तथा डेटा-टूल्स का प्रबंधन निर्णायक भूमिका निभाने लगा है। देश का शायद ही कोई ऐसा वर्ग हो जहाँ निराशा और असंतोष का गहरा भंवर न उठा हो— किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी के लिए वर्षों से सड़क पर हैं, युवा वर्ग पेपर लीक, भर्ती न होने और नौकरियों की कमी के कारण हताश है, उद्योग जगत जीएसटी, नोटबंदी और लगातार आर्थिक मंदी की मार से कराह रहा है, और यहाँ तक कि शिक्षाविद, पत्रकार और न्यायिक वर्ग के भीतर भी ‘दबाव’ और ‘डर’ के वातावरण की चर्चा आम हो चुकी है। 

इस सबके बावजूद, चुनावी नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अजेय जीत का सिलसिला लगातार जारी है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को यह कठोर निष्कर्ष निकालने पर मजबूर कर दिया है कि “जब कोई खुश नहीं — फिर भी बीजेपी जीतती कैसे है?” यह तीखा विरोधाभास एक ही सत्य की ओर इशारा करता है: लोकतंत्र का चेहरा तो बचा है, पर उसकी आत्मा का गला घोंटा जा चुका है।

विपक्ष का सीधा आरोप है कि सत्ताधारी दल ने भारतीय लोकतंत्र को एक “डिजिटल कंट्रोल सिस्टम” में बदल दिया है, जिससे जनादेश अब जनता की मर्जी से नहीं, बल्कि सिस्टम की सेटिंग से तय होता है। चुनावी प्रक्रिया में सामने आ रही गड़बड़ियाँ इस आरोप को बल देती हैं। 

विपक्ष का दावा है कि वोटर लिस्ट में हेराफेरी के जरिए लाखों वैध नाम काटे गए हैं, EVM पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि ट्रांसपेरेंट ऑडिट से जानबूझकर परहेज किया जाता है, और मतगणना के कई चरणों में रुझान अचानक पलटते हैं। इन आरोपों के केंद्र में चुनाव आयोग की भूमिका है, जिस पर विपक्षी दल खुलकर सत्ताधारी दल का “सहयोगी अंग” बनने का आरोप लगा चुके हैं। 

एक वरिष्ठ विपक्षी नेता के शब्दों में, “देश का हर वर्ग दुखी है, लेकिन बीजेपी खुश है क्योंकि उसके पास जनता नहीं, सिस्टम है।” इस पूरे चक्र में मुख्यधारा का मीडिया भी आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने या खरीदने का काम कर रहा है, जबकि सोशल मीडिया पर “इको चैंबर” बनाकर विपक्षी आवाज़ों को दबाया जा रहा है, और सरकारी विज्ञापनों तथा डेटा एनालिटिक्स के जरिये मतदाता की सोच को मोड़ा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत ‘जनता के मन’ की नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की सेटिंग’ की जीत है। चुनाव अब समान अवसर की प्रतिस्पर्धा नहीं रहे, वे प्रबंधन, धनबल और डेटा-टूल्स का ऐसा खेल बन चुके हैं जहाँ नायक पहले से तय होता है और जनता केवल दर्शक रह जाती है। 

यह कड़वी सच्चाई आज की राजनीति को उस बिंदु पर ले आई है जहाँ भारत में लोकतंत्र का चेहरा ज़िंदा है, पर उसकी आत्मा मर चुकी है। आज की राजनीति का कड़वा निष्कर्ष यह है कि जनता वोट डालती है, पर फैसला सिस्टम करता है। यही कारण है कि जब हर तबका असंतुष्ट है, तब भी सत्ता मुस्कुरा रही है — क्योंकि अब “वोट जनता का है, पर नतीजा सिस्टम का।”

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