जनवरी 2025 में जब महाराष्ट्र सरकार ने आँकड़े जारी किए कि बीते महीनों में राज्य में 1246 बाल विवाह रोके गए, तो यह महज़ संख्या नहीं थी — यह सामाजिक परिवर्तन की एक प्रेरणादायी तस्वीर थी। जहाँ पहले ग्रामीण अंचलों में बाल विवाह को “परंपरा” और “संकोच का समाधान” माना जाता था, वहीं अब जागरूकता, शिक्षा और प्रशासनिक हस्तक्षेप की बदौलत यह मानसिकता तेजी से बदल रही है।
2018–19 में राज्य भर में जहाँ केवल 187 बाल विवाह रोके गए थे, वहीं 2024-25 में यह संख्या सात गुना से भी अधिक हो जाना एक क्रांतिकारी प्रगति का संकेत है। यह संभव हुआ है सामाजिक कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी सेविकाओं, ग्राम पंचायतों और पुलिस प्रशासन के समन्वित प्रयासों से। अब माता-पिता खुद बाल विवाह के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे हैं — ये दिखाता है कि समाज जाग रहा है और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर पहले से कहीं अधिक सतर्क और सजग हो चुका है।
बाल विवाह रोकने का यह प्रयास केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि बालिकाओं को उनके सपनों के पंख देने का संकल्प है। शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता जैसे मोर्चों पर जो छोटे-छोटे कदम उठाए गए हैं, उन्होंने हजारों लड़कियों की ज़िंदगी बदल दी है। अब वह महज़ किसी की बहू या पत्नी बनने के लिए नहीं, बल्कि एक डॉक्टर, टीचर, इंजीनियर या अधिकारी बनने के लिए सपने देखती हैं।
इस जागरूकता अभियान में सामुदायिक रेडियो, नाटक, नुक्कड़ सभाएँ, मोबाइल वैन और सोशल मीडिया ने भी बड़ी भूमिका निभाई। सरकार की योजनाएँ — जैसे “सुकन्या समृद्धि योजना”, “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, और किशोरी बालिका जागरूकता मिशन — अब वास्तविक ज़मीन पर असर दिखा रही हैं।
यह आँकड़ा सिर्फ बचाई गई 1246 शादियाँ नहीं, बल्कि 1246 बचपन, 1246 सपने और 1246 नई कहानियाँ हैं, जो महाराष्ट्र के गांवों, कस्बों और शहरों में पनप रही हैं। और सबसे अच्छी बात — यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, यह तो शुरुआत भर है उस नए भारत की जो अपने बच्चों को आगे बढ़ने का पूरा हक देता है।




