अमरनाथ कुमार | मुंबई 27 दिसंबर 2025
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज़ है। लंबे समय से टूट, टकराव और अविश्वास के दौर से गुजर रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को लेकर अब सुलह और एकीकरण की चर्चाएं ज़ोर पकड़ने लगी हैं। जिस पार्टी को शरद पवार ने दशकों की मेहनत, संघर्ष और सांगठनिक कौशल से खड़ा किया था, वही पार्टी हाल के वर्षों में सत्ता की खींचतान और अंदरूनी कलह के चलते दो हिस्सों में बंट गई। अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है—क्या पवार परिवार और NCP एक बार फिर साथ आने की तैयारी में हैं? और अगर ऐसा हुआ, तो अजित पवार और सुप्रिया सुले की भूमिका क्या होगी?
लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने इन चर्चाओं को और हवा दी है। महाराष्ट्र में विपक्ष की कमजोर होती स्थिति, सत्तारूढ़ गठबंधन की मज़बूती और आने वाले विधानसभा व स्थानीय निकाय चुनाव—इन सभी ने यह साफ कर दिया है कि बिखरी हुई राजनीति से किसी को फायदा नहीं हो रहा। पार्टी के भीतर यह एहसास गहराता जा रहा है कि टकराव की राजनीति अब नुकसानदेह साबित हो रही है और वक्त की मांग एकजुटता की है, चाहे उसके लिए कितनी ही राजनीतिक कड़वाहट क्यों न निगलनी पड़े।
सूत्रों के मुताबिक, यदि NCP के दोनों गुटों का विलय होता है, तो इसके पीछे एक सोचा-समझा राजनीतिक ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है। इस फार्मूले के तहत अजित पवार को महाराष्ट्र की राजनीति की कमान सौंपे जाने की संभावना जताई जा रही है। यानी राज्य में संगठन को संभालना, विधायकों और कार्यकर्ताओं को एक सूत्र में बांधना और सत्ता की रणनीति तय करना—यह ज़िम्मेदारी अजित पवार के कंधों पर आ सकती है। अजित पवार को एक सख्त प्रशासक, तेज़ फैसले लेने वाले और जमीनी पकड़ रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है, जिनका राज्य की राजनीति पर प्रभाव आज भी कायम है।
वहीं दूसरी ओर, सुप्रिया सुले के लिए दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका तय होने की चर्चा है। सुले पहले से ही संसद में एक सशक्त, संतुलित और मुद्दों पर बेबाकी से बोलने वाली नेता के रूप में पहचानी जाती हैं। माना जा रहा है कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का चेहरा बनाने, विपक्षी गठबंधन में सक्रिय भूमिका निभाने और केंद्र की राजनीति में NCP की आवाज़ बुलंद करने की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है। यह बंटवारा केवल पदों का नहीं, बल्कि राज्य और केंद्र—दोनों मोर्चों पर पार्टी को मज़बूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में शरद पवार की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पवार अब सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे पीछे हटकर मार्गदर्शक की भूमिका में जाना चाहते हैं। उनका अनुभव, राजनीतिक समझ और स्वीकार्यता आज भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी है, लेकिन समय की मांग है कि नेतृत्व की बागडोर अगली पीढ़ी को सौंपी जाए। ऐसे में यह संभावित विलय सिर्फ सत्ता का समझौता नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन और पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया भी हो सकता है।
हालांकि यह राह बिल्कुल आसान नहीं है। पार्टी के भीतर कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में अब भी आशंकाएं मौजूद हैं। कुछ को डर है कि विलय के बाद उनकी राजनीतिक हैसियत कमजोर पड़ सकती है, तो कुछ के मन में पुराने घाव और अविश्वास अब भी ताज़ा हैं। अजित पवार की पिछली बगावत और अचानक लिए गए फैसलों की यादें आज भी कई नेताओं के लिए सवाल खड़े करती हैं। यही वजह है कि एकीकरण की चर्चाओं के साथ-साथ असहमति और बेचैनी की आवाज़ें भी दबे स्वर में सुनाई दे रही हैं।
अगर यह विलय होता है, तो इसका असर सिर्फ NCP तक सीमित नहीं रहेगा। महाराष्ट्र की राजनीति में इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। विपक्ष को एक संगठित और मज़बूत ताकत मिल सकती है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन को सीधी चुनौती दे सके। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी मतदाताओं तक, NCP अपने पुराने जनाधार को फिर से साधने की कोशिश कर सकती है। साथ ही, शरद पवार की राजनीतिक विरासत को एक नई दिशा और नई ऊर्जा देने का अवसर भी पार्टी के सामने होगा।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि संवाद के दरवाज़े खुल चुके हैं। राजनीति में जो कल तक असंभव लगता था, वह आज मुमकिन नज़र आ रहा है। अब देखना यह है कि क्या चाचा-भतीजे और बेटी की यह संभावित जुगलबंदी सचमुच हकीकत बनती है, या फिर यह चर्चा भी महाराष्ट्र की राजनीति की अनगिनत अटकलों में शामिल होकर रह जाएगी।




