एबीसी नेशनल न्यूज | बीजिंग | 1 मार्च 2026
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक चौंकाने वाला दावा तेजी से वायरल हो रहा है कि चीन वर्ष 2026 में दुनिया का पहला ऐसा “गेस्टेशन रोबोट” या “प्रेग्नेंसी रोबोट” लॉन्च करने जा रहा है, जो कृत्रिम गर्भ में भ्रूण को विकसित कर एक जीवित शिशु को जन्म देने में सक्षम होगा। इस दावे के साथ साझा की जा रही तस्वीरों में मानव आकार के रोबोट के भीतर गर्भस्थ शिशु को दिखाया गया है, जिससे लोगों में जिज्ञासा के साथ-साथ आशंका भी पैदा हो रही है। हालांकि, वैज्ञानिक तथ्यों की पड़ताल करने पर स्थिति कहीं अधिक जटिल और प्रारंभिक चरण की दिखाई देती है। अब तक ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा या प्रमाणित वैज्ञानिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है, जिसमें यह पुष्टि हो कि चीन या किसी अन्य देश ने मानव शिशु को पूरी नौ महीने की अवधि तक कृत्रिम गर्भ में सफलतापूर्वक विकसित कर जन्म दिलाया हो।
दरअसल, जिस तकनीक को “गेस्टेशन रोबोट” कहा जा रहा है, वह वैज्ञानिक भाषा में “एक्टोजेनेसिस” (Ectogenesis) की अवधारणा से जुड़ी है। इसका अर्थ है—भ्रूण का विकास प्राकृतिक गर्भाशय के बाहर किसी नियंत्रित, कृत्रिम वातावरण में कराना। चीन सहित कई देशों में इस दिशा में शोध अवश्य चल रहा है, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य अभी पूर्ण मानव गर्भधारण को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि अत्यधिक समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं (प्री-टर्म बेबी) को बचाना है। 2021 में चीन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रणाली पर अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें लैब में विकसित भ्रूणों की कृत्रिम निगरानी के लिए एआई-आधारित प्रणाली का उल्लेख था। यह प्रणाली मुख्यतः भ्रूण के प्रारंभिक विकास की निगरानी के लिए थी, न कि पूर्ण गर्भावधि के लिए।
इस क्षेत्र में चीन अकेला देश नहीं है। 2017 में अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों ने “बायोबैग” नामक एक प्रयोगात्मक प्रणाली विकसित की थी, जिसमें समय से पहले जन्मे मेमने के भ्रूण को गर्भ जैसे वातावरण में कुछ समय तक सुरक्षित रखा गया था। इसी प्रकार जापान और यूरोप के कई संस्थानों में भी प्री-टर्म शिशुओं के लिए कृत्रिम गर्भ जैसे वातावरण तैयार करने पर शोध जारी है। लेकिन इन प्रयोगों का दायरा अभी पशु परीक्षणों या अत्यंत सीमित प्रयोगशाला चरण तक ही सीमित है। मानव शिशु को गर्भाधान से लेकर जन्म तक पूरी तरह बाहरी कृत्रिम प्रणाली में विकसित करने की उपलब्धि अभी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में पूर्ण कृत्रिम गर्भ तकनीक विकसित भी हो जाती है, तो यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं रहेगा, बल्कि इसके सामाजिक, नैतिक और कानूनी आयाम अत्यंत जटिल होंगे। मातृत्व की परिभाषा, अभिभावक अधिकार, भ्रूण चयन, जैविक संशोधन और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्न नए सिरे से उठ खड़े होंगे। क्या यह तकनीक केवल अमीर वर्ग तक सीमित रहेगी? क्या इससे पारंपरिक परिवार व्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा? क्या इससे जैविक हस्तक्षेप और “डिज़ाइनर बेबी” जैसी अवधारणाओं को बढ़ावा मिलेगा? ये सभी मुद्दे गहन बहस की मांग करते हैं।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना अधिक उचित होगा कि “2026 में लाइव बेबी देने वाला प्रेग्नेंसी रोबोट” जैसी खबरें वैज्ञानिक प्रगति से अधिक सनसनीखेज प्रस्तुति का परिणाम प्रतीत होती हैं। शोध अवश्य जारी है और चिकित्सा विज्ञान लगातार नए आयाम छू रहा है, लेकिन किसी भी क्रांतिकारी तकनीक को प्रयोगशाला से वास्तविक जीवन में सुरक्षित रूप से लागू करने में वर्षों—कभी-कभी दशकों—का समय लगता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर वायरल दावों को तथ्यात्मक कसौटी पर परखना आवश्यक है, ताकि विज्ञान की वास्तविक उपलब्धियों और प्रचारात्मक दावों के बीच स्पष्ट अंतर समझा जा सके।




