राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल
पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा को स्पष्ट रूप से बताने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू नहीं किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने खाद्य नियामक से सवाल किया कि क्या वह नहीं चाहता कि देश के बच्चे स्वस्थ होकर बड़े हों। अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत में पैकेज्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के सेवन तथा बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल की मांग पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई केरल स्थित गैर-सरकारी संगठन 3S and Our Health Society की याचिका पर हुई। याचिकाकर्ता संगठन ने केंद्र सरकार से पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है। याचिका का मूल तर्क यह है कि उपभोक्ता को किसी खाद्य उत्पाद को खरीदते समय उसकी प्रमुख पोषण संबंधी विशेषताओं की जानकारी आसानी से और तुरंत मिलनी चाहिए, ताकि वह अधिक सूचित विकल्प चुन सके।
चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट पर जोर
मामले में खास तौर पर ऐसे उत्पादों पर चेतावनी या स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी देने का सवाल है जिनमें चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक हो सकती है। वर्तमान में उपभोक्ता को पैकेज के पीछे या किनारे दिए गए पोषण संबंधी विवरण को पढ़कर इन चीजों की जानकारी हासिल करनी पड़ती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग से महत्वपूर्ण जानकारी उपभोक्ता की नजर के सामने आ सकती है और खरीदारी के समय निर्णय लेना आसान हो सकता है।
अदालत ने बच्चों के स्वास्थ्य को बनाया केंद्र में
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर था। पीठ ने FSSAI से सवाल किया कि क्या वह नहीं चाहता कि बच्चे स्वस्थ होकर बड़े हों। अदालत की यह टिप्पणी केवल लेबलिंग के तकनीकी पहलू तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस बात की ओर भी संकेत करती है कि खाद्य नियमन को सार्वजनिक स्वास्थ्य, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य, के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
बच्चों के खान-पान में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए खाद्य उत्पादों की पोषण संबंधी जानकारी को सरल और आसानी से समझ आने वाले तरीके से उपलब्ध कराने की मांग लंबे समय से सार्वजनिक स्वास्थ्य की बहस का हिस्सा रही है।
FSSAI से क्यों अपेक्षा की जाती है कड़ी कार्रवाई की?
FSSAI देश में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और मानकों से संबंधित प्रमुख नियामक संस्था है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के केंद्र में यह सवाल रहा कि यदि किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा उपभोक्ता के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, तो उसकी जानकारी पैकेट के सामने स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराने की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का उद्देश्य उपभोक्ता को लंबी पोषण तालिका पढ़े बिना उत्पाद की प्रमुख पोषण विशेषताओं के बारे में तत्काल संकेत देना होता है। इससे विशेष रूप से उन उपभोक्ताओं को मदद मिल सकती है जो पोषण संबंधी तकनीकी शब्दों और विस्तृत तालिकाओं को आसानी से नहीं समझ पाते।
पैकेज्ड फूड और सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी बहस
अदालत में उठा यह मामला केवल लेबलिंग की व्यवस्था का तकनीकी विवाद नहीं है। इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि खाद्य उद्योग में उपभोक्ता के स्वास्थ्य और व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की बड़ी बाजार हिस्सेदारी है और कंपनियां अलग-अलग प्रकार के स्नैक्स, पेय पदार्थ, इंस्टेंट फूड और अन्य तैयार खाद्य उत्पाद बेचती हैं। ऐसे में उपभोक्ता को उत्पाद की पोषण संबंधी वास्तविकता समझने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
खासकर बच्चों के मामले में यह सवाल अधिक संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि कम उम्र में खान-पान की आदतें आगे के जीवन की जीवनशैली और स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकती हैं।
लेबलिंग से उपभोक्ता को क्या फायदा हो सकता है?
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी व्यवस्था का मूल उद्देश्य जानकारी को सरल बनाना है। यदि किसी पैकेज्ड उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक है, तो पैकेट के सामने स्पष्ट संकेत उपभोक्ता को खरीदारी के समय तुरंत सावधान कर सकता है। इसके जरिए उपभोक्ता अलग-अलग उत्पादों की तुलना भी अधिक आसानी से कर सकता है।
इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत खरीदारी तक सीमित नहीं हो सकता। ऐसी व्यवस्था खाद्य कंपनियों को भी अपने उत्पादों की संरचना पर पुनर्विचार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, क्योंकि स्पष्ट लेबलिंग के कारण अत्यधिक चीनी, नमक या वसा वाले उत्पाद उपभोक्ता के सामने अधिक स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकते हैं।
अब FSSAI के सामने बड़ी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब नजर FSSAI और केंद्र सरकार के अगले कदम पर रहेगी। सवाल यह है कि भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल को लेकर नियामकीय व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ती है। क्या मौजूदा पोषण लेबलिंग व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा? क्या चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिक मात्रा वाले उत्पादों के लिए अलग चेतावनी व्यवस्था तैयार होगी? और यदि ऐसा किया जाता है तो उसे लागू करने की समयसीमा क्या होगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले समय में इस मामले की दिशा तय कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से एक व्यापक संदेश यह भी निकलता है कि खाद्य सुरक्षा का मतलब केवल यह सुनिश्चित करना नहीं है कि कोई उत्पाद जहरीला या असुरक्षित न हो। इसमें यह भी शामिल है कि उपभोक्ता को अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने के लिए पर्याप्त, स्पष्ट और आसानी से समझ आने वाली जानकारी मिले।
चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी पैकेट पर कहां और किस रूप में दी जाए, यह भले ही नियामकीय सवाल हो, लेकिन अदालत ने इसे बच्चों के स्वस्थ भविष्य से जोड़कर इसे कहीं अधिक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे में बदल दिया है।
अब निगाह अगले कदम पर
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद अब FSSAI और केंद्र सरकार के सामने यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल को लेकर उनकी नीति क्या है। अदालत ने जिस तरह बच्चों के स्वास्थ्य को सवाल के केंद्र में रखा है, उससे संकेत मिलता है कि आने वाली सुनवाई में केवल लेबलिंग की तकनीकी व्यवस्था ही नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकार, खाद्य उद्योग की जिम्मेदारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े व्यापक पहलुओं पर भी चर्चा हो सकती है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि पैकेट पर क्या लिखा जाए—सवाल यह है कि उपभोक्ता को वह जानकारी कितनी साफ दिखाई दे, जिसे जानना उसके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।




