आलोक कुमार | नई दिल्ली 18 दिसंबर 2025
राजनीति में समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, लेकिन कभी-कभी बदलाव इतने तेज़ और इतने साफ़ होते हैं कि सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है। साल 2008–10 में जब यूपीए सरकार अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील लेकर आई थी, तब भारतीय जनता पार्टी ने इसे देश की संप्रभुता के साथ “समझौता” बताया था। संसद से सड़क तक कहा गया कि यह भारत को अमेरिका के सामने झुका देगा, कि यह परमाणु ऊर्जा के नाम पर राष्ट्रीय हितों की बलि है। उस समय बीजेपी का तेवर साफ था—परमाणु ऊर्जा पर किसी भी तरह का विदेशी दबाव देश के लिए खतरनाक है।
लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलटी है। वही बीजेपी सरकार एक ऐसा बिल पास कर रही है, जो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की एंट्री को आसान बनाता है और सप्लायर लाइबिलिटी (आपूर्तिकर्ता की ज़िम्मेदारी) को काफी हद तक कमजोर करता है। यह वही लाइबिलिटी है, जिसे भोपाल गैस त्रासदी जैसे हादसों के बाद भारत ने बहुत सोच-समझकर अपने कानून में शामिल किया था—ताकि अगर कभी कोई बड़ा परमाणु हादसा हो, तो जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या जनता पर न आए, बल्कि उपकरण और तकनीक देने वाली कंपनियां भी जवाबदेह हों।
तथ्य यह है कि भारत का परमाणु दायित्व कानून (Civil Liability for Nuclear Damage Act, 2010) दुनिया के उन गिने-चुने कानूनों में है, जो पीड़ितों के पक्ष में थोड़ा मजबूत माना जाता है। इसी कानून की वजह से कई विदेशी कंपनियां भारत में निवेश को लेकर हिचकिचाती रही हैं। अब जब इस जिम्मेदारी को “डायल्यूट” किया जा रहा है, तो साफ है कि मकसद निजी और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना है। सवाल यह नहीं कि निवेश आए या न आए, सवाल यह है कि जोखिम किसके सिर मढ़ा जाएगा—कंपनियों के या आम नागरिकों के?
यह भी संयोग नहीं है कि यह रुख अमेरिकी हितों से मेल खाता है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन खुलकर चाहता रहा है कि भारत अपने परमाणु कानूनों को नरम करे, ताकि अमेरिकी कंपनियों के लिए रास्ता साफ हो। आज जो कदम उठाया जा रहा है, वह लगभग वही है जिसकी मांग वॉशिंगटन से होती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब बीजेपी इसे “अमेरिका की गुलामी” कहती थी, और आज इसे “आर्थिक सुधार” और “ऊर्जा सुरक्षा” का नाम दिया जा रहा है।
यहां असल सवाल बीजेपी बनाम कांग्रेस का नहीं है। असल सवाल राजनीति की उस सच्चाई का है, जिसे जनता अक्सर महसूस तो करती है, लेकिन शब्दों में नहीं कह पाती—जहां आप राजनीति में खड़े होते हैं, वह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहां बैठे हैं। विपक्ष में रहते हुए जो नीति राष्ट्रविरोधी लगती है, वही सत्ता में आते ही व्यावहारिक और ज़रूरी सुधार बन जाती है।
परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह बदलाव सिर्फ नीति का नहीं, भरोसे का भी है। जनता को यह जानने का हक है कि अगर कल कोई हादसा होता है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी। क्या मुनाफा निजी कंपनियों का होगा और जोखिम देश का? यह सवाल 2008 में भी उतना ही अहम था, और आज भी उतना ही है।
समय बदलता है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन लोकतंत्र में याददाश्त का छोटा होना सबसे बड़ा खतरा है। सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता। और यह याद दिलाना भी जरूरी है कि जो कल गलत था, वह आज सिर्फ इसलिए सही नहीं हो जाता क्योंकि कुर्सी बदल गई है।




