ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 जून 2026
भारतीय राजनीति का शायद सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिन नेताओं को उनके जीवनकाल में सबसे अधिक कमज़ोर बताया गया, इतिहास अक्सर उन्हीं के पक्ष में सबसे मजबूत गवाही देता है। डॉ. मनमोहन सिंह भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं। एक दशक तक उन्हें “मौन”, “कमज़ोर” और “रिमोट कंट्रोल से चलने वाला प्रधानमंत्री” कहकर राजनीतिक हमलों का निशाना बनाया गया। लेकिन समय बीतने के साथ एक बड़ा सवाल बार-बार सामने आ रहा है—क्या वास्तव में मनमोहन सिंह कमज़ोर थे, या फिर भारत की राजनीति ने शोर को ताकत और संयम को कमजोरी समझ लिया था?
2013 का देवयानी खोबरागड़े प्रकरण इस बहस का सबसे बड़ा उदाहरण है। दिसंबर 2013 में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े को न्यूयॉर्क में अमेरिकी अधिकारियों ने गिरफ्तार किया। भारत ने इसे केवल एक अधिकारी का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न माना। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने अभूतपूर्व कूटनीतिक प्रतिक्रिया दी। नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास को मिली कई विशेष सुविधाओं की समीक्षा की गई, सुरक्षा बैरिकेड हटाए गए, विशेष पहचान और पास संबंधी व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार किया गया और स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारत अपने अधिकारियों के सम्मान पर समझौता नहीं करेगा।
दुनिया की सबसे शक्तिशाली महाशक्ति अमेरिका के सामने भारत का यह रुख प्रतीकात्मक नहीं था। यह उस भारत का संदेश था जो आर्थिक रूप से उभर रहा था और वैश्विक मंच पर अपनी गरिमा को लेकर सजग था। यह वही दौर था जब भारत-अमेरिका संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का नया आयाम दिया जा रहा था, फिर भी राष्ट्रीय सम्मान के मुद्दे पर भारत पीछे नहीं हटा। यह घटना आज भी भारतीय कूटनीति के सबसे सशक्त उदाहरणों में गिनी जाती है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आदेश रावल का कहना है कि आज जब हाल की घटनाओं में भारतीय नागरिकों और नाविकों की मौत के मामलों पर सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब देवयानी प्रकरण की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनके अनुसार 2013 में भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया था कि चाहे सामने अमेरिका ही क्यों न हो, भारतीय सम्मान सर्वोपरि है। रावल का तर्क है कि उस समय जिस दृढ़ता और स्पष्टता के साथ भारत ने प्रतिक्रिया दी थी, वैसी मुखरता आज कम दिखाई देती है।
यह तुलना केवल दो प्रधानमंत्रियों की नहीं है, बल्कि दो राजनीतिक शैलियों की भी है। एक तरफ डॉ. मनमोहन सिंह थे, जिनकी राजनीति में शालीनता थी, भाषणों से अधिक फाइलों और फैसलों पर भरोसा था और जिन्होंने आर्थिक सुधारों से लेकर परमाणु समझौते तक कई ऐतिहासिक निर्णय लिए। दूसरी तरफ आज का दौर है, जहां राजनीतिक संचार, छवि निर्माण और जनसंपर्क राजनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुके हैं।
यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, दूरसंचार, आधारभूत ढांचा और वैश्विक निवेश के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भी भारत अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते से लेकर अफ्रीका और एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका तक, उनकी विदेश नीति ने भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत किया।
उनके आलोचक भ्रष्टाचार के आरोपों और यूपीए सरकार की चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं, लेकिन उनके समर्थक यह तर्क देते हैं कि किसी भी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि उसके शासन, अर्थव्यवस्था, संस्थागत मर्यादाओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए।
आज जब राजनीति अक्सर शोर, प्रचार और आक्रामक बयानबाजी के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, तब मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व एक अलग तरह का प्रश्न खड़ा करता है—क्या नेतृत्व का अर्थ केवल ऊंची आवाज़ में बोलना है, या फिर संकट के समय ऐसे फैसले लेना भी है जो दुनिया को भारत की ताकत का एहसास कराएं?
हो सकता है कि इस प्रश्न पर मतभेद हों। हो सकता है कि नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह की तुलना को लेकर अलग-अलग राजनीतिक राय हों। लेकिन यह कहना कठिन है कि इतिहास ने अभी तक मनमोहन सिंह के योगदान का पूरा मूल्यांकन कर लिया है। जिस व्यक्ति को वर्षों तक “कमज़ोर” कहा गया, उसी ने कई मौकों पर दुनिया को दिखाया कि शांत नेतृत्व भी उतना ही दृढ़ हो सकता है।
शायद इसलिए आज भी देवयानी खोबरागड़े प्रकरण जैसे उदाहरण याद दिलाते हैं कि ताकत हमेशा शोर नहीं करती। कभी-कभी वह चुपचाप फैसले लेती है और पूरी दुनिया को उनका संदेश सुनाई देता है।




