राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026
1999 का कारगिल युद्ध खत्म हुआ तो भारत ने अपनी कब्जाई गई पहाड़ी चौकियां वापस हासिल कर लीं, लेकिन पाकिस्तान में इस युद्ध की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कारगिल की हार के बाद पाकिस्तान की सत्ता के भीतर ऐसा टकराव शुरू हुआ, जिसने कुछ ही महीनों में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार को गिरा दिया। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में थे पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ। कारगिल में सैन्य रणनीति बनाने वाले मुशर्रफ इसके बाद पाकिस्तान की सत्ता के सबसे ताकतवर व्यक्ति बने, भारत के साथ बातचीत की मेज पर बैठे और आखिरकार राजनीतिक संकट, न्यायपालिका से टकराव और देशद्रोह के मुकदमे तक पहुंचे।
‘ऑपरेशन सफेद सागर’ कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना की भूमिका और 1999 के संघर्ष को सामने लाती है। युद्ध का अंत भारतीय सेना की विजय और कारगिल की ऊंची चोटियों पर दोबारा तिरंगा फहराए जाने के साथ होता है। लेकिन इस जीत के बाद पाकिस्तान में घटनाक्रम बेहद तेजी से बदला। कारगिल अभियान की योजना को लेकर मुशर्रफ और नवाज शरीफ के बीच मतभेद गहरे थे। कई रिपोर्टों के अनुसार मुशर्रफ ने राजनीतिक नेतृत्व को पूरी जानकारी नहीं दी थी। भारत ने जब पाकिस्तानी घुसपैठियों और सैनिकों को पीछे धकेलना शुरू किया तो पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ने लगा। 4 जुलाई 1999 को नवाज शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात की और नियंत्रण रेखा से पीछे हटने की दिशा में कदम बढ़ाया। पाकिस्तान की सेना के लिए यह बड़ा झटका था। युद्ध समाप्त होने के बाद इस बात को लेकर विवाद बढ़ा कि कारगिल अभियान की जानकारी राजनीतिक नेतृत्व को कितनी थी और इस सैन्य कार्रवाई के लिए जिम्मेदारी किसकी थी।
यहीं से मुशर्रफ और नवाज शरीफ के बीच सत्ता संघर्ष तेज हुआ। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान की स्थिति कमजोर होने के बाद नवाज शरीफ सरकार पर सवाल उठ रहे थे। दूसरी तरफ सेना में भी प्रधानमंत्री के फैसलों को लेकर नाराजगी थी। यह टकराव कुछ ही महीनों में उस स्थिति तक पहुंच गया, जब पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार और सेना आमने-सामने आ गईं।
फिर आया 12 अक्टूबर 1999। नवाज शरीफ सरकार ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख के पद से हटाने की कोशिश की। मुशर्रफ उस समय श्रीलंका दौरे पर थे। जब उनका विमान कराची वापस लौट रहा था तो लैंडिंग की अनुमति नहीं दी गई। सेना ने मुशर्रफ का साथ दिया। कुछ ही घंटों में पाकिस्तान की सत्ता पर सैन्य नियंत्रण स्थापित हो गया। नवाज शरीफ को गिरफ्तार कर लिया गया और मुशर्रफ ने देश की कमान अपने हाथ में ले ली। इस तरह कारगिल युद्ध के बाद पैदा हुआ राजनीतिक तनाव सीधे सैन्य तख्तापलट में बदल गया। मुशर्रफ ने शुरुआत में खुद को पाकिस्तान का ‘चीफ एग्जीक्यूटिव’ घोषित किया। संविधान निलंबित कर दिया गया। बाद में जून 2001 में उन्होंने खुद को राष्ट्रपति बना लिया और सेना प्रमुख का पद भी अपने पास रखा।
अब वही जनरल, जो कुछ महीने पहले कारगिल की सैन्य योजना के केंद्र में थे, पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति बन चुके थे। उनके शासन में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर लगातार विवाद बना रहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी भूमिका जल्द ही बदलने वाली थी।
11 सितंबर 2001 के अमेरिका पर आतंकी हमलों के बाद दुनिया की राजनीति पूरी तरह बदल गई। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू किया और अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ अभियान चलाया। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और अफगानिस्तान से निकटता के कारण मुशर्रफ अचानक अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए। पाकिस्तान ने अमेरिकी अभियान में सहयोग किया। मुशर्रफ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण किरदार बन गए। उन्होंने ‘एनलाइटनमेंट मॉडरेशन’ का नारा दिया। लेकिन देश के अंदर आतंकी संगठन उनके खिलाफ हो गए। 2003 में मुशर्रफ दो बार हत्या के प्रयासों से बाल-बाल बचे। एक बार पुल उड़ाया गया और कुछ दिनों बाद कार बम हमले हुए।
भारत के साथ उनका रिश्ता अब भी बेहद जटिल था। कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच भरोसा लगभग खत्म हो चुका था। इसके बावजूद मुशर्रफ और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच बातचीत का रास्ता खुला। 2001 का आगरा शिखर सम्मेलन इसी कोशिश का हिस्सा था। जुलाई 2001 में मुशर्रफ भारत आए। ताजमहल का दीदार किया। कश्मीर समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई। मुशर्रफ ने चार सूत्री फॉर्मूला भी रखा था जिसमें नियंत्रण रेखा की मौजूदा स्थिति को बनाए रखते हुए दोनों हिस्सों के बीच आवाजाही और सहयोग बढ़ाने जैसी बातें शामिल थीं। उम्मीद थी कि शायद कारगिल के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आएगा। लेकिन आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। वार्ता किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच पाई। मुशर्रफ अचानक अपनी यात्रा बीच में छोड़कर पाकिस्तान लौट गए। अजमेर शरीफ जाने का कार्यक्रम भी रद्द हो गया।
इसके बाद भी भारत-पाकिस्तान संबंधों में बातचीत का दौर चलता रहा। मुशर्रफ ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कुछ प्रस्ताव सामने रखे। हालांकि यह प्रयास भी किसी अंतिम समझौते में नहीं बदल सके। 2002 में उन्होंने विवादास्पद जनमत संग्रह करवाया और अपने शासन को वैध ठहराने की कोशिश की। उसी साल संसदीय चुनाव हुए जिसमें उनके समर्थक दल आगे रहे।
इधर पाकिस्तान में मुशर्रफ के खिलाफ राजनीतिक विरोध बढ़ता गया। 2007 में न्यायपालिका के साथ उनका टकराव गंभीर रूप ले गया। मार्च 2007 में मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी को हटाने की कोशिश के बाद वकीलों का आंदोलन खड़ा हुआ। यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया। टेलीविजन चैनलों ने इसे लगातार कवर किया। मुशर्रफ की सत्ता की पकड़ कमजोर होने लगी। नवंबर 2007 में उन्होंने आपातकाल लगाया और संविधान को निलंबित कर दिया। दर्जनों जजों को पद से हटाया गया। मीडिया और राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदियां लगाई गईं। वकीलों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
इसी दौर में पाकिस्तान की राजनीति को एक और बड़ा झटका लगा। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो अक्टूबर 2007 में निर्वासन से लौटीं। दिसंबर 2007 में रावलपिंडी में एक रैली के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। देश में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई। 2008 के चुनावों में मुशर्रफ समर्थक ताकतों को बड़ा नुकसान हुआ और विपक्ष मजबूत होकर सामने आया।
अब मुशर्रफ के सामने महाभियोग का खतरा था। जिस सैन्य शक्ति के सहारे उन्होंने 1999 में सत्ता हासिल की थी, वही राजनीतिक व्यवस्था अब उनके खिलाफ खड़ी हो रही थी। आखिरकार अगस्त 2008 में उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और पाकिस्तान छोड़कर विदेश चले गए।
लेकिन मुशर्रफ की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। पाकिस्तान लौटने के बाद उन्हें कई कानूनी मामलों का सामना करना पड़ा। सबसे गंभीर मामला 2007 में संविधान को निलंबित कर आपातकाल लगाने से जुड़ा देशद्रोह का मुकदमा था। 2019 में एक विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। हालांकि इस फैसले की कानूनी स्थिति बाद में बदल गई और मामला पाकिस्तान की न्यायिक प्रक्रिया में लंबे विवाद का विषय बना रहा। मुशर्रफ इलाज के नाम पर दुबई चले गए और वहां से कभी स्थायी रूप से वापस नहीं लौटे।
मुशर्रफ अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दुबई में रहे। लंबे समय से एमिलॉयडोसिस जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे परवेज मुशर्रफ का 5 फरवरी 2023 को 79 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
इस तरह कारगिल युद्ध के बाद मुशर्रफ का सफर बेहद असाधारण रहा। एक सैन्य अधिकारी, कारगिल अभियान का प्रमुख चेहरा, लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट करने वाला शासक, पाकिस्तान का राष्ट्रपति, भारत के साथ शांति वार्ता करने वाला नेता, अमेरिका का रणनीतिक सहयोगी और अंततः देशद्रोह के मुकदमे का सामना करने वाला निर्वासित पूर्व शासक।
यानी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ जहां कारगिल की पहाड़ियों पर खत्म होती है, वहीं मुशर्रफ की असली कहानी वहां से शुरू होती है। कारगिल की हार ने पाकिस्तान की राजनीति में जो भूचाल पैदा किया, उसने नवाज शरीफ की सरकार गिराई, मुशर्रफ को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया और करीब एक दशक बाद उन्हें उसी सत्ता से बेदखल भी कर दिया। इतिहास में मुशर्रफ का नाम अब एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है जिसने पाकिस्तान को सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर लौटाने की प्रक्रिया को भी तेज कर दिया, भले ही वह प्रक्रिया उनके खिलाफ ही क्यों न चली हो।




