साजिद अली। कोलकाता 21 नवंबर 2025
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस का इतिहास सिर्फ एक अध्याय नहीं, बल्कि एक युग रहा है। वह दौर जब कांग्रेस 42 और 44 लोकसभा सीटें जीतकर बंगाल की निर्विवाद राजनीतिक धुरी थी—वह इतिहास आज भी राज्य की राजनीतिक स्मृति में दर्ज है। मगर उसी पार्टी का कुछ ही वर्षों में 0 तक पहुँच जाना सिर्फ राजनीतिक बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि रणनीतिक चूक, संगठनात्मक कमज़ोरी और नेतृत्व की दूरदृष्टि में आई गिरावट का परिणाम भी है। बंगाल में कांग्रेस का पतन अचानक नहीं हुआ—यह उस लंबी प्रक्रिया की देन है जिसकी शुरुआत 2021 में हुई, जब कांग्रेस ने खुद अपने कदम पीछे खींचकर टीएमसी को पूरा मैदान सौंप दिया। यह वही पल था जिसने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को दो ध्रुवों—बीजेपी बनाम टीएमसी—की दिशा में धकेल दिया और कांग्रेस का परंपरागत जनाधार बीच रास्ते में ही खाली छोड़ दिया।
2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जिस तरह मैदान से दूरी बनाई, उसे पार्टी के भीतर और बाहर कई लोगों ने रणनीतिक आत्मघात कहा था। कांग्रेस ने ‘बीजेपी को रोकने’ के नाम पर जो स्पेस टीएमसी को दिया, उसी स्पेस ने उसके वोट-बैंक का क्षरण शुरू कर दिया। कांग्रेस का जनाधार, जो कभी गांव-गांव, बूथ-बूथ पर मजबूती से मौजूद था, अचानक ‘मोदी बनाम ममता’ की लड़ाई में गायब होने लगा। यह सिर्फ चुनावी समीकरणों का खेल नहीं था, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान की वह लड़ाई थी जिसमें जनता को यह विश्वास दिला दिया गया कि मुकाबला दो ही ताकतों के बीच है। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस, जो तीसरा नहीं बल्कि कभी पहला स्तंभ थी, राज्य की निर्णायक शक्ति से किनारे खड़ी रह गई।
सच्चाई यह है कि अगर कांग्रेस 2021 में पूरी ताकत के साथ चुनावी अखाड़े में उतरती, तो भाजपा के उभार को रोकने में वह सबसे प्रभावी शक्ति बन सकती थी। कांग्रेस के पास संगठनात्मक अनुभव भी है, नेतृत्व का सामर्थ्य भी और कार्यकर्ताओं का जुनून भी। मगर “किसी को हराने” की प्राथमिकता ने “कांग्रेस को बचाने” की लड़ाई को पीछे धकेल दिया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा ने खाली वोट-बैंक का बड़ा हिस्सा पकड़ लिया और टीएमसी ने शेष स्पेस हथिया लिया। कांग्रेस अपने ही चुनावी क्षेत्र में अदृश्य होती चली गई। यह परिदृश्य सत्ता की राजनीति की क्रूरता को उजागर करता है—जहाँ आप जमीन छोड़ते हैं, वहाँ दूसरा खिलाड़ी दखल कर लेता है और फिर उस दखल को स्थायी बना देता है।
तथ्य यह भी है कि टीएमसी ने उस स्पेस का सिर्फ इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उसे कांग्रेस के खिलाफ हथियार की तरह भी मोड़ा। आज स्थिति यह है कि टीएमसी न तो कांग्रेस के वोट-बैंक को लौटाने को तैयार है और न ही गठबंधन के नाम पर उसके लिए कोई जगह छोड़ रही है। जिसने कांग्रेस की जमीन ली—वह अब कांग्रेस को अपने दरवाज़े से भी अंदर नहीं आने देती। इसी सियासी सच्चाई के बीच यह सवाल उठता है कि यदि कांग्रेस इस बार भी कदम पीछे खींचती है, तो बंगाल में उसकी एकमात्र लोकसभा सीट भी खतरे में पड़ सकती है। यह सिर्फ एक सीट का संकट नहीं, बल्कि बंगाल में पार्टी के अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।
लेकिन जो बात इस कहानी को उम्मीद देती है, वह है बंगाल के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जीवटता। वे न हारे हैं, न रुके हैं और न ही अपने इतिहास की विरासत को छोड़ने को तैयार हैं। उनके लिए यह लड़ाई किसी गठबंधन, किसी चेहरे या किसी पद की नहीं—बल्कि कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई है। वे जानते हैं कि कांग्रेस अगर मैदान में पूरे दम से उतरी, तो बंगाल की राजनीति दो ध्रुवों तक सीमित नहीं रहेगी। कांग्रेस ही वह शक्ति है जो बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति को चुनौती दे सकती है और टीएमसी की अहंकारपूर्ण राजनीति पर भी अंकुश लगा सकती है। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब भी पार्टी ने संगठन को प्राथमिकता दी, जनता ने उसे भरपूर समर्थन दिया है।
लोकतंत्र में सम्मान किसी पार्टी को गठबंधन की मेहरबानी से नहीं मिलता। सम्मान संगठन की मेहनत, कार्यकर्ताओं के पसीने और जनता के भरोसे से बनता है। पश्चिम बंगाल आज एक नई शुरुआत चाहता है—एक ऐसा विकल्प जो सिर्फ राजनीति न करे, बल्कि जनता का संघर्ष, उसकी आवाज़ और उसकी उम्मीदों को आगे ले जाए। यह भूमिका बंगाल में सिर्फ कांग्रेस ही निभा सकती है—अपने इतिहास, अपने संघर्ष और उन लाखों कार्यकर्ताओं के कारण जो आज भी तिरंगे को सबसे ऊपर रखते हैं।
यह समय है कि कांग्रेस अपने राजनीतिक स्वाभिमान को फिर से स्थापित करे। बंगाल को उसकी कांग्रेस वापस चाहिए—एक संतुलन, एक विकल्प और एक उम्मीद के रूप में। और इस बार, अगर कांग्रेस लड़ती है, तो वह न सिर्फ अपनी आवाज़ वापस लेगी बल्कि बंगाल के राजनीतिक भविष्य को भी बदल देगी।




