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हमें और दीपकों की ज़रूरत है – राहुल गांधी

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एबीसी नेशनल न्यूज | 2 फरवरी 2026 | नई दिल्ली

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उत्तराखंड के कोटद्वार निवासी दीपक को “भारत का हीरो” बताते हुए कहा है कि आज के दौर में देश को ऐसे ही लोगों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, जो डर और दबाव के बावजूद संविधान और इंसानियत के साथ खड़े रहने का साहस रखते हों। राहुल गांधी ने कहा कि दीपक अकेले एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि उस सोच का प्रतीक हैं जो नफ़रत, असहिष्णुता और भय के माहौल में भी झुकने से इनकार करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस संविधान को देश की आत्मा कहा जाता है, उसे भाजपा और संघ परिवार लगातार कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसे समय में दीपक जैसे लोग देश की उम्मीद बनकर सामने आते हैं।

राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा कि दीपक “नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान” की तरह हैं और यही बात सत्ता को सबसे ज़्यादा चुभती है। उनके मुताबिक संघ परिवार जानबूझकर देश में सामाजिक और आर्थिक ज़हर घोल रहा है, ताकि समाज बँटा रहे और डर के सहारे सत्ता चलती रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार उन असामाजिक तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें मौन समर्थन दे रही है, जो आम नागरिकों को डराने, धमकाने और चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि नफ़रत, डर और अराजकता के माहौल में कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। शांति और सामाजिक सौहार्द के बिना विकास सिर्फ़ एक नारा बनकर रह जाता है। उन्होंने दोहराया कि भारत की प्रगति का रास्ता संविधान, भाईचारे और इंसानियत से होकर ही जाता है, न कि विभाजन और भय की राजनीति से। राहुल गांधी ने भावुक अपील करते हुए कहा, “हमें और दीपकों की ज़रूरत है—जो झुकें नहीं, जो डरें नहीं और जो पूरी ताक़त से संविधान के साथ खड़े रहें। हम तुम्हारे साथ हैं। डरो मत। तुम बब्बर शेर हो।”

इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी दीपक के समर्थन में बयान दिया। उन्होंने कहा कि कोटद्वार का दीपक अब सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं रहा, बल्कि वह पूरे उत्तराखंड और देश के उन लोगों का प्रतीक बन गया है, जो ग़लत, अन्याय और असहिष्णुता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस रखते हैं। हरीश रावत ने कहा कि दीपक का अर्थ ही रोशनी दिखाने वाला होता है और दीपक कुमार ने यह साबित किया है कि जब हालात मुश्किल हों, तब भी सच के साथ खड़ा हुआ जा सकता है। उन्होंने कहा, “दीपक सिर्फ़ एक नाम नहीं है, वह न्याय की रोशनी है।”

इसी संदर्भ में यह बहस भी तेज़ हो गई है कि देश को ऐसे इंसानियत के दीपकों की आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। इतिहास बताता है कि सत्ता, ताक़त और बहुमत की आड़ में लिए गए कई फैसले समय के साथ अमानवीय साबित हुए, जबकि कठिन दौर में इंसानियत और विवेक का साथ देने वाले लोग आज भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं। धर्म, जाति और विचारधारा के नाम पर सदियों से चले आ रहे अत्याचारों ने दुनिया को बार-बार यह सिखाया है कि नफ़रत और हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती।

आज पाकिस्तान, बांग्लादेश, फिलिस्तीन, यूक्रेन, इज़राइल और गाज़ा जैसे इलाकों में आम आदमी डर और असुरक्षा के बीच जी रहा है। बांग्लादेश में हालात जिस तरह बिगड़े हैं, वह इस बात का उदाहरण हैं कि जब समाज में असहिष्णुता बढ़ती है, तो सबसे पहले इंसानियत की आवाज़ें दबाई जाती हैं। वहाँ भी दीपक जैसे लोग पैदा होते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें शुरुआत में ही कुचल दिया जाता है।

भारत के अपने इतिहास में भी इसके उदाहरण मौजूद हैं। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय दोनों ओर जिन लोगों की जान बची, उनके पीछे ऐसे ही साहसी लोगों की भूमिका थी, जिन्होंने धर्म और पहचान से ऊपर उठकर इंसान को इंसान समझा। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पलायन के दौरान उन्हें सहारा देने वाले कई मुसलमान भी उसी हिंसा के शिकार बने। यह तथ्य सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन समय के साथ उन लोगों को भुला दिया गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति का धर्म सच में इंसानियत है, तो उसे हर हाल में अपने व्यवहार से साबित करना होगा। यह साबित करना भाषणों या नारों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के फैसलों से होता है। जब समाज ऐसे लोगों के साथ खड़ा होता है, तभी नफ़रत और डर का अंधेरा कम होता है।

देश और समाज को बेहतर बनाने का कोई आसान रास्ता नहीं है। जब हर गली, हर मोहल्ले और हर घर में इंसानियत के ऐसे दीपक जलेंगे, तभी इतिहास यह दर्ज करेगा कि इस दौर ने चुप्पी नहीं चुनी, बल्कि साहस चुना। यही वह रास्ता है जिससे पीढ़ियाँ भी हमें याद रखेंगी और सदियाँ भी।

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