एबीसी नेशनल न्यूज 24 जनवरी 2026
नई दिल्ली। भारतीय रूपये की हालत इन दिनों वाकई चिंता बढ़ाने वाली है। मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 91.99 तक फिसल गया, यानी 92 के बिल्कुल पास। यह अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और दुनिया भर में बढ़ता तनाव है। 2026 की शुरुआत से ही रूपया दबाव में चल रहा है। दिसंबर 2025 में यह पहली बार 90 के पार गया था और अब महज 20 दिनों में 91 का आंकड़ा भी टूट गया। दुनिया में अनिश्चितता का माहौल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियां, यूरोप से बढ़ता तनाव और ‘ग्रीनलैंड’ को लेकर विवाद ने निवेशकों को डरा दिया है। ऐसे में लोग भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर और सोने जैसे सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग रहे हैं। नतीजा साफ है—डॉलर मजबूत होता जा रहा है और रूपया कमजोर।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कांग्रेस, विपक्षी दल और आम लोग तंज कस रहे हैं— “एक अकेला डोनाल्ड ट्रंप, 92 मोदी के बराबर हो गया!”
रुपया क्यों गिर रहा है? तीन बड़ी वजहें
सबसे पहली वजह विदेशी निवेशकों की बिकवाली है। जनवरी 2026 के पहले 22 दिनों में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 36,500 करोड़ रुपये निकाल लिए। जब वे पैसा वापस ले जाते हैं तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है, और इससे रुपया और नीचे चला जाता है। दूसरी वजह वैश्विक तनाव और ट्रंप की टैरिफ नीतियां हैं। इससे निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है और वे सुरक्षित निवेश की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। तीसरी वजह अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था और ऊंची ब्याज दरें हैं। वहां बेरोजगारी घटी है और इकोनॉमी मजबूत दिख रही है, इसलिए निवेशकों को लग रहा है कि वहां ब्याज दरें अभी ऊंची बनी रहेंगी। ज्यादा मुनाफे की उम्मीद में पैसा अमेरिकी बॉन्ड और बैंकों में जा रहा है, जिससे डॉलर और ताकतवर हो रहा है।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
CR फॉरेक्स एडवाइजर्स के एमडी अमित पाबारी का कहना है कि 92.00 का स्तर रूपए के लिए बड़ी रुकावट बन सकता है। अगर वैश्विक हालात कुछ शांत होते हैं, तो रुपया 90.50 से 90.70 तक वापस संभल सकता है। रूपया कमजोर होने का मतलब है कि इम्पोर्ट महंगा होगा। इससे पेट्रोल-डीजल, मोबाइल-टीवी, दवाइयों और दूसरी जरूरी चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। विदेश घूमना और पढ़ना भी अब पहले से ज्यादा खर्चीला हो जाएगा।
सोचिए, पहले 1 डॉलर के लिए जहां 50 रुपये देने पड़ते थे, अब 92 रूपये खर्च करने होंगे। इससे विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की फीस, रहने-खाने और बाकी खर्च काफी बढ़ जाएंगे।
डॉलर के मुकाबले किसी करेंसी की कीमत गिरने को करेंसी डेप्रिसिएशन कहा जाता है। हर देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय लेनदेन करता है। भंडार घटे तो करेंसी कमजोर होती है, बढ़े तो मजबूत। अगर भारत के पास डॉलर का भंडार मजबूत रहेगा तो रूपया संभल सकता है, लेकिन डॉलर की कमी इसे और दबाव में डाल देगी। विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक अनिश्चितता ने रुपए को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। अगर हालात नहीं सुधरे, तो इसका बोझ आम लोगों की जेब पर और भारी पड़ सकता है।




