नजीब मालिक | 28 दिसंबर 2025
उत्तर प्रदेश के बरेली से सामने आई घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कानून का राज है या कट्टरपंथी हुड़दंगियों का? एक नर्सिंग छात्रा के जन्मदिन समारोह पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का हमला, मारपीट, धार्मिक नफरत फैलाने के आरोप और फिर पुलिस की संदिग्ध कार्रवाई—यह सब मिलकर एक खतरनाक तस्वीर पेश करता है। यह सिर्फ एक जन्मदिन पार्टी पर हमला नहीं है, बल्कि सामाजिक सौहार्द, व्यक्तिगत आज़ादी और संविधान की आत्मा पर सीधा वार है।
27 दिसंबर को बरेली के एक कैफे में नर्सिंग की छात्रा अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन मना रही थी। समूह में छह लड़कियां और चार लड़के थे, जिनमें दो मुस्लिम युवक भी शामिल थे। तभी भगवा गमछे पहने बजरंग दल के लोग वहां घुस आए, हंगामा किया, मारपीट की और तथाकथित “लव जिहाद” का आरोप लगाते हुए युवाओं को आतंकित किया। यह सब खुलेआम हुआ—कैमरों के सामने, गवाहों के बीच। यह वही पुराना तरीका है, जहां कट्टरपंथी संगठन खुद को कानून से ऊपर समझते हुए भीड़तंत्र चलाते हैं।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि पुलिस मौके पर पहुंचने के बावजूद हमलावरों पर सख्ती करने के बजाय पीड़ितों पर कार्रवाई करती दिखी। पुलिस के अपने बयान के मुताबिक कोई आपत्तिजनक या गैरकानूनी गतिविधि नहीं पाई गई, फिर भी “शांति व्यवस्था” के नाम पर दो मुस्लिम युवकों और एक कैफे कर्मचारी पर बीएनएसएस की धाराओं में चालान कर दिया गया। वहीं, हंगामा मचाने वाले बजरंग दल के लोगों को समझा-बुझाकर भेज दिया गया। सवाल सीधा है—शांति भंग किसने की? जन्मदिन मनाने वालों ने या लाठी-डंडे लेकर घुसने वालों ने?
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में पुलिसकर्मी खुद जन्मदिन मना रही लड़की से उलझते और शारीरिक रूप से खींचतान करते दिख रहे हैं। यह दृश्य न सिर्फ परेशान करने वाला है, बल्कि यह बताता है कि राज्य की ताकत किसके खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है। क्या अब दोस्ती, साथ बैठना, जन्मदिन मनाना भी अपराध है—अगर उसमें धर्म अलग-अलग हो?
यह घटना किसी एक शहर या एक दिन की नहीं है। यह उस हिंदूवादी कट्टरपंथी मानसिकता का नतीजा है, जिसे खुलेआम संरक्षण मिलता रहा है। वही चेहरे, वही आरोप, वही “लव जिहाद” का रटा-रटाया झूठ—और हर बार निशाने पर अल्पसंख्यक युवक। इससे भी ज्यादा खतरनाक यह है कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस खुद इस नाटक का हिस्सा बनती दिख रही है। बरेली पुलिस का X पर दिया गया बयान पढ़कर यही लगता है कि जैसे प्रशासन का पूरा जोर सच्चाई सामने लाने पर नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों को बचाने पर है।
अब सवाल सिर्फ आलोचना का नहीं, कड़ी और तत्काल कार्रवाई का है। ऐसे हुड़दंगी संगठनों के खिलाफ “समझाइश” नहीं, बल्कि कानून का डंडा चलना चाहिए। जो लोग भीड़ बनाकर हमला करते हैं, मारपीट करते हैं, धार्मिक नफरत फैलाते हैं—उन्हें गैरकानूनी संगठन की तरह ट्रीट किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि आखिर पीड़ितों को ही आरोपी क्यों बनाया गया।
यह घटना उन तमाम दावों पर करारा तमाचा है, जिनमें कहा जाता है कि “भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं।” अगर सुरक्षा का मतलब यह है कि जन्मदिन मनाने पर भी डर लगे, दोस्ती पर शक किया जाए और इंसाफ के बजाय चालान थमा दिया जाए—तो यह सुरक्षा नहीं, डर का राज है। अब भी वक्त है। सरकार और प्रशासन को तय करना होगा—संविधान के साथ खड़ा होना है या कट्टरपंथी हुड़दंगियों के साथ। अगर आज सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो कल यह आग किसी और के घर तक जरूर पहुंचेगी।




