एबीसी नेशनल न्यूज | 31 जनवरी 2026
गुवाहाटी। असम से सामने आई यह घटना सिर्फ एक रिक्शा किराए की बहस नहीं है, बल्कि संविधान, इंसानियत और रोज़गार के अधिकार पर सीधा हमला है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक महिला, कैमरे के सामने, एक मेहनतकश मुस्लिम रिक्शा चालक को पूरा किराया देने से इनकार करती है और खुले तौर पर कहती है कि वह मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma के बयान का पालन कर रही है—“₹5 की जगह ₹4 दो।” यह कोई निजी तकरार नहीं, बल्कि सत्ता के शब्दों का आम आदमी की जिंदगी पर पड़ा सीधा असर है, जहां एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की टिप्पणी सड़क पर खड़े गरीब इंसान के आत्मसम्मान को कुचलने का बहाना बन जाती है।वीडियो में रिक्शा चालक शांत है, बहस नहीं करता, विरोध नहीं करता। वह अपमान को चुपचाप सहता है, क्योंकि उसके सामने सवाल सिर्फ ₹1 का नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी का है। अगर वह आवाज़ उठाए, तो अगली सवारी नहीं मिलेगी; अगर पुलिस या प्रशासन से उलझे, तो वही शक के घेरे में आ जाएगा। यही वह डर है, जिसे ऐसे बयानों से और गहरा किया जाता है। आलोचकों का कहना है कि यह घटना दिखाती है कि कैसे सत्ता की भाषा समाज के एक हिस्से को यह संदेश देती है कि कुछ लोग बराबरी के हकदार नहीं हैं।
यह पूरा विवाद उस बयान से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर ‘मिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कुछ रिक्शा चालकों को कम भुगतान करने की बात कही गई थी। अब वही बयान ज़मीन पर व्यवहार में बदलता दिख रहा है—जहां आम लोग खुद को यह अधिकार दे रहे हैं कि वे पहचान देखकर किसी इंसान की मेहनत की कीमत तय करें। सवाल उठता है कि क्या किसी की जाति, धर्म या पहचान देखकर उसका मेहनताना घटाया जा सकता है? अगर आज यह रिक्शा चालक के साथ हो रहा है, तो कल किसी और मजदूर, ठेलेवाले या दिहाड़ी मज़दूर की बारी क्यों नहीं आएगी?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस मामले में अब तक प्रशासन और न्यायिक संस्थानों की चुप्पी सवालों के घेरे में है। क्या यह हेट स्पीच के दायरे में नहीं आता? क्या एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के बयान से प्रेरित होकर किसी नागरिक द्वारा किए गए खुले भेदभाव पर स्वतः संज्ञान (suo motu) नहीं लिया जाना चाहिए? आलोचक पूछ रहे हैं कि जब जानवरों के अधिकारों पर सड़कें भर जाती हैं, तब एक इंसान के जीने और कमाने के अधिकार पर हो रहे इस खुले हमले पर खामोशी क्यों?
देशभर में इस वीडियो को लेकर गुस्सा और बेचैनी है। सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि यह मामला असम तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक चरित्र की परीक्षा है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर की वह पंक्ति बार-बार याद की जा रही है—“Injustice anywhere is a threat to justice everywhere.” सवाल अब सीधा है: क्या इस अन्याय के खिलाफ कोई जिम्मेदार आवाज़ उठेगी, या यह चुप्पी ही आने वाले समय की सबसे खतरनाक मिसाल बनेगी?




