एबीसी डेस्क 25 दिसंबर 2025
त्योहार की रात और उठते सवाल
क्रिसमस की पूर्व संध्या आमतौर पर शांति, प्रार्थना और आपसी सद्भाव का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन इस बार देश के कुछ हिस्सों से सामने आए घटनाक्रमों ने उस भावना को झकझोर दिया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम और ओडिशा समेत कुछ अन्य राज्यों से वायरल वीडियो, स्थानीय बयानों और संगठनों की प्रतिक्रियाओं के बीच यह बहस तेज़ हुई कि क्या भारत में अल्पसंख्यक समुदाय अपने त्योहार बिना डर के मना पा रहे हैं। यह सवाल किसी एक घटना तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर सामने आए मिलते-जुलते प्रसंगों से जुड़ता है। हर जगह नफरती विचारधारा और कट्टरपंथियों ने भारत की साझा विरासत पर चोट किया है। संघ, बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और करनी सेना के लोगों ने जहां तहां ईसाइयों को परेशान करने का काम किया है।
असम: नलबाड़ी में स्कूल परिसर से जुड़ा विवाद
असम के नलबाड़ी ज़िले (पनिगांव) स्थित सेंट मैरी स्कूल को लेकर सामने आए वीडियो और स्थानीय निवासियों के बयानों में आरोप है कि क्रिसमस ईव की रात स्कूल परिसर में घुसकर छात्रों द्वारा तैयार की गई सजावट को नुकसान पहुँचाया गया। पोस्टर-बैनर जलाए जाने और नारेबाज़ी की बातें सामने आईं। स्कूल प्रशासन और अभिभावकों का कहना है कि यह मामला केवल संपत्ति का नहीं, बल्कि बच्चों के मन में असुरक्षा पैदा करने का है—क्योंकि जिन सजावटों को नुकसान पहुँचा, वे छात्रों की मेहनत और उत्सव की तैयारी का प्रतीक थीं। प्रशासन ने जाँच की बात कही है, जबकि समुदाय निष्पक्ष कार्रवाई की माँग कर रहा है।
उत्तर प्रदेश: बरेली में चर्च के बाहर जुटान
बरेली (उत्तर प्रदेश) में एक चर्च के बाहर हनुमान चालीसा पाठ के आयोजन को लेकर भी बहस छिड़ी। आयोजकों का दावा है कि यह शांतिपूर्ण धार्मिक अभिव्यक्ति थी और किसी तरह की हिंसा या परिसर में प्रवेश नहीं किया गया। वहीं, स्थानीय ईसाई समुदाय का कहना है कि त्योहार के समय चर्च के बाहर इस तरह का जमावड़ा भय और दबाव का माहौल बनाता है, भले ही वह भीतर न गया हो। मुद्दा यहाँ धार्मिक पाठ से अधिक समय, स्थान और प्रभाव का बनता है—क्या किसी समुदाय के पवित्र स्थल के बाहर त्योहार के दिन ऐसा प्रदर्शन असहजता पैदा करता है?
ओडिशा: पुरी के बाज़ार में रोज़ी-रोटी का सवाल
पुरी (ओडिशा) से वायरल एक वीडियो में सड़क किनारे सांता टोपी बेच रही महिलाओं को कथित तौर पर परेशान किए जाने के दृश्य दिखाई दिए। वीडियो में यह कहा जाता सुना गया कि ऐसी वस्तुएँ नहीं बेची जानी चाहिए। ये महिलाएँ किसी प्रचार या धार्मिक गतिविधि में नहीं, बल्कि अपने परिवार का पेट पालने के लिए व्यापार कर रही थीं। इस घटना ने बहस को आर्थिक आज़ादी और धार्मिक पहचान के बीच खींच दी—क्या रोज़गार भी अब पहचान की कसौटी पर तय होगा?
आँकड़े, दावे और बढ़ती चिंता
ईसाई संगठनों और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि 2025 में नवंबर तक देशभर में हज़ारों घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जिनमें चर्च सेवाओं में व्यवधान, धार्मिक कार्यक्रमों पर दबाव या सामाजिक डराने-धमकाने के आरोप शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी भारत में क्रिसमस आयोजनों के दौरान तनाव की रिपोर्टें आई हैं, जिससे देश की वैश्विक छवि पर असर को लेकर चिंता जताई जा रही है। दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने कहा है कि ऐसी घटनाएँ किसी भी धर्म की मूल भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
कानून-व्यवस्था और प्रशासन की कसौटी
इन घटनाओं ने प्रशासनिक तैयारी और निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए हैं। धर्म की स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार है—फिर त्योहार मनाने वालों को अतिरिक्त सुरक्षा की ज़रूरत क्यों पड़ती है? क्या घटनाओं के बाद तत्काल और पारदर्शी कार्रवाई हुई? क्या वीडियो सामने आने पर समान रूप से जाँच शुरू की गई? ये प्रश्न केवल एक समुदाय के नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी से जुड़े हैं।
राजनीतिक बयान और सामाजिक असर
घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर तीखे बयान, आरोप-प्रत्यारोप और प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। समर्थक और आलोचक—दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रखते दिखे। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बयानबाज़ी के बीच आम लोग—बच्चे, महिलाएँ, छोटे व्यापारी—सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके लिए बहस से ज़्यादा ज़रूरी सुरक्षा और भरोसा है।
भारत की पहचान और आगे की राह
यह बहस किसी एक धर्म बनाम दूसरे धर्म की नहीं, बल्कि भारत के विचार की है—वह विचार जो विविधता को ताक़त मानता है। आज यदि क्रिसमस पर विवाद है, तो कल किसी और त्योहार पर भी हो सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि तथ्यों की निष्पक्ष जाँच, दोषियों की जवाबदेही, और पीड़ितों को विश्वास दिया जाए—ताकि त्योहार डर के साए में नहीं, कानून और सह-अस्तित्व की सुरक्षा में मनाए जा सकें।
आख़िरी सवाल
क्या बच्चों की सजावट, महिलाओं की रोज़ी-रोटी और किसी समुदाय की प्रार्थना इतनी बड़ी चुनौती हैं कि वे डर और दबाव का कारण बनें? यदि जवाब ‘न’ है, तो इसे ज़मीन पर साबित करना—आज—हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।




