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अघोषित आपातकाल: 2025 के दो महीनों में 33 पत्रकारों पर हमले, 3,070 बार इंटरनेट बंद और 785 खबरें रोकी गईं

महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 25 दिसंबर 2025

साल 2025 भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए बेचैन करने वाली तस्वीर लेकर आई। सिर्फ़ पहले दो महीनों में सामने आए आँकड़े यह दिखाते हैं कि सवाल पूछने वाली आवाज़ें, ज़मीनी सच दिखाने वाले पत्रकार और डिजिटल माध्यम—तीनों ही लगातार दबाव में हैं। यह कोई राजनीतिक बहस भर नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक माहौल का संकेत है जिसमें सच कहना और सुनना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।

दो महीनों में कम से कम 33 पत्रकारों पर हमले दर्ज किए गए। इनमें शारीरिक हमले, धमकियाँ, गिरफ़्तारियाँ, पुलिस पूछताछ और कानूनी दबाव जैसे कई रूप शामिल हैं। कई पत्रकारों का कसूर सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने सत्ता से जुड़े सवाल उठाए, प्रशासनिक लापरवाही दिखाई या आम लोगों की आवाज़ को सामने रखा। इन घटनाओं ने यह डर और गहरा कर दिया है कि आज पत्रकारिता सिर्फ़ पेशा नहीं, बल्कि जोखिम बनती जा रही है।

इसी दौरान देशभर में 3,070 बार इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए। इंटरनेट अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है—यह छात्रों की पढ़ाई, मज़दूरों की दिहाड़ी, छोटे व्यापारियों की कमाई और नागरिकों के संवाद का आधार है। जब इंटरनेट बंद होता है, तो सिर्फ़ नेटवर्क नहीं कटता, बल्कि लोगों का दुनिया से जुड़ाव टूट जाता है। बार-बार होने वाले शटडाउन यह सवाल उठाते हैं कि क्या यह सचमुच कानून-व्यवस्था के लिए ज़रूरी कदम हैं, या असहमति को नियंत्रित करने का आसान रास्ता?

डिजिटल मीडिया की स्थिति भी अलग नहीं रही। इन्हीं दो महीनों में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 785 न्यूज़-ब्लॉकिंग आदेश जारी किए, जिनके तहत विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से खबरें और कंटेंट हटाने के निर्देश दिए गए। इन आदेशों का असर बड़े मीडिया संस्थानों से लेकर छोटे स्वतंत्र पोर्टल और व्यक्तिगत पत्रकारों तक पड़ा। कई मामलों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस खबर को किस आधार पर हटाया गया, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

इन तीनों तथ्यों को एक साथ देखें—पत्रकारों पर हमले, इंटरनेट शटडाउन और खबरों को ब्लॉक करने के आदेश—तो एक बड़ी और बेचैन करने वाली तस्वीर सामने आती है। यह तस्वीर बताती है कि सवाल पूछने की जगह सिमट रही है और असहमति को धीरे-धीरे असुविधा के रूप में देखा जाने लगा है। जबकि लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताक़त मानी जाती है।

यह मुद्दा किसी एक सरकार या संस्था तक सीमित नहीं है। इसका असर हर नागरिक पर पड़ता है। क्योंकि जब पत्रकार डर में काम करते हैं, जब इंटरनेट बार-बार बंद होता है और जब खबरें खामोशी से गायब हो जाती हैं, तो अंततः नुकसान आम आदमी के जानने के अधिकार का होता है।

2025 के शुरुआती दो महीने हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए सिर्फ़ चुनाव काफी नहीं होते। उसे ज़िंदा रखती हैं आवाज़ें, सवाल और सूचनाएँ—और इन्हीं की आज सबसे कड़ी परीक्षा हो रही है।

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