एबीसी नेशनल न्यूज | 3 फरवरी 2026
नई दिल्ली। पत्रकारों को संबोधित करते हुए Rahul Gandhi ने महीनों पहले साफ शब्दों में कहा था कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील जरूर होगी, लेकिन वह बराबरी की नहीं होगी। उन्होंने तब ही आगाह कर दिया था कि डील कैसे होगी, उसकी शर्तें क्या होंगी—यह सब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump तय करेंगे और प्रधानमंत्री Narendra Modi झुककर उन्हें स्वीकार करेंगे। आज सामने आ रहे घटनाक्रम, वॉशिंगटन से आ रहे बयान और नई दिल्ली की चुप्पी उसी चेतावनी की पुष्टि करते दिखते हैं। भारतीय राजनीति में कुछ नेता घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जिनकी चेतावनियाँ समय के साथ भविष्यवाणी जैसी साबित होती हैं—राहुल गांधी अब उसी दूसरी श्रेणी में गिने जाने लगे हैं। उनका ताज़ा हमला केवल विपक्षी राजनीति नहीं, बल्कि उस नीति-दिशा पर गहरी चिंता है, जिस दिशा में देश को ले जाया जा रहा है।
यह ओपिनियन किसी एक नेता के कथन का महज विस्तार नहीं, बल्कि उन तथ्यों और संकेतों का विश्लेषण है जो सार्वजनिक डोमेन में लगातार उभर रहे हैं। जिस भारत-अमेरिका ट्रेड डील को सरकार “ऐतिहासिक” और “बराबरी की साझेदारी” बताकर पेश कर रही है, उसके ठोस ब्योरे संसद से अधिक अमेरिका से सामने आ रहे हैं। यह तथ्य अपने आप में असहज करने वाला है। किसी भी संप्रभु लोकतंत्र में व्यापार, कृषि और आर्थिक नीतियों की घोषणा देश की निर्वाचित सरकार करती है—विदेशी राष्ट्रपति नहीं। राहुल गांधी की आपत्ति यहीं से शुरू होती है और यहीं से यह ओपिनियन सरकार से सीधा सवाल पूछता है—आखिर देश को भरोसे में क्यों नहीं लिया जा रहा?
राहुल गांधी का तर्क है कि यह डील साझेदारी नहीं, बल्कि एकतरफा समझौता है। जब टैरिफ घटाने, नॉन-टैरिफ बैरियर खत्म करने और बाजार खोलने की घोषणाएँ अमेरिकी राष्ट्रपति खुले मंच से कर रहे हों और भारत सरकार चुप्पी साधे बैठी हो, तो “बराबरी” का दावा खोखला लगने लगता है। यह चुप्पी महज कूटनीतिक रणनीति नहीं दिखती, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचने की कोशिश प्रतीत होती है। संसद में बहस के बिना, राज्यों और हितधारकों को सुने बिना ऐसे फैसले लेना भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में न केवल असामान्य है, बल्कि खतरनाक भी है।
संप्रभुता का सवाल इस पूरे विमर्श के केंद्र में है। पहले सीजफायर की घोषणा और अब ट्रेड डील की जानकारी—अगर दोनों ही मामलों में पहल अमेरिका से हो रही है, तो यह भारत की निर्णय-स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। ट्रंप का यह कहना कि डील “मोदी की रिक्वेस्ट” पर हो रही है, कूटनीतिक भाषा भर नहीं रह जाता; यह भारत की गरिमा और आत्मसम्मान पर टिप्पणी बन जाता है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका से व्यापार होना चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या भारत अपनी शर्तों पर बात कर रहा है, या किसी दबाव में झुक रहा है।
यदि 0% टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर खत्म करने की बात सच साबित होती है, तो उसका असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। भारतीय बाजार का पूरी तरह खुलना छोटे व्यापारियों, स्थानीय दुकानदारों, कुटीर उद्योगों और MSME सेक्टर के लिए सीधी चुनौती बनेगा—वह भी तब, जब ये वर्ग पहले ही महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी के दबाव से जूझ रहे हैं। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा तब खोखला प्रतीत होता है, जब जमीनी हकीकत ‘परनिर्भर भारत’ की ओर बढ़ती दिखे। मुक्त व्यापार आवश्यक हो सकता है, लेकिन बिना सुरक्षा-कवच के मुक्त बाजार आत्मघाती भी साबित हो सकता है—यह चेतावनी इतिहास बार-बार देता रहा है।
कृषि का प्रश्न सबसे संवेदनशील है। भारत में खेती केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों आदमियों की पहचान, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा हुआ सवाल है। यदि भारतीय कृषि बाजार को विदेशी ताकतों के लिए खोला जा रहा है, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह किसानों को स्पष्ट और लिखित गारंटी दे। MSP, मंडी व्यवस्था और छोटे-सीमांत किसानों की सुरक्षा पर बनी चुप्पी राहुल गांधी के आरोपों को और धार देती है। यह आशंका निराधार नहीं कि कहीं खेती भी कॉरपोरेट सौदेबाजी का हिस्सा न बन जाए, जहाँ मुनाफा प्राथमिक हो और किसान गौण।
ऊर्जा नीति और विदेश नीति पर उठे सवाल भी इसी कड़ी में आते हैं। रूस से सस्ता तेल छोड़कर अमेरिका या वेनेजुएला से महंगा तेल खरीदने की बात यदि किसी ट्रेड डील की शर्त है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के विरुद्ध जा सकती है। विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हित होना चाहिए—न कि किसी व्यापारिक समझौते का साइड-इफेक्ट। जब विदेश नीति सौदेबाजी का औजार बनने लगे, तो उसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम देश को भुगतने पड़ते हैं—चाहे वह महंगाई हो, रणनीतिक निर्भरता हो या वैश्विक मंच पर कमजोर होती स्थिति।
‘मेक इन इंडिया’ बनाम ‘इम्पोर्ट मॉडल’ की बहस अब नारेबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस वास्तविकता बन चुकी है। आयात बढ़ने पर घरेलू उत्पादन दबाव में आता है, कारखाने ठहरते हैं और रोजगार घटता है। राहुल गांधी का तंज यहीं सटीक बैठता है—जब रेड कारपेट विदेशी सामान के लिए बिछाई जाएगी, तो देशी उद्योग कैसे खड़े रहेंगे? यह सवाल केवल विपक्ष का नहीं, बल्कि हर उस आदमी का है जिसकी रोज़ी-रोटी उत्पादन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी है।
कॉरपोरेट पक्षपात का आरोप इस ओपिनियन का अंतिम, लेकिन निर्णायक बिंदु है। यदि नीतियाँ चुनिंदा उद्योगपतियों के फायदे के अनुसार ढलें और सार्वजनिक संपत्तियाँ धीरे-धीरे कुछ हाथों में सिमटती जाएँ, तो लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ता है। राहुल गांधी द्वारा लिया गया गौतम अडानी का नाम राजनीतिक है, लेकिन उसके पीछे उठाया गया सवाल नीतिगत है—क्या सरकार सबके लिए काम कर रही है, या कुछ खास लोगों के लिए?
यह ओपिनियन किसी एक नेता के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही के पक्ष में है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील की हर शर्त, हर प्रतिबद्धता और हर संभावित असर को संसद और जनता के सामने रखा जाना चाहिए। चुप्पी लोकतंत्र की ताकत नहीं—उसकी कमजोरी होती है। यह सिर्फ सरकार का सवाल नहीं; यह किसानों, व्यापारियों और करोड़ों आदमियों के भविष्य का सवाल है।
राहुल गांधी की “राजनीतिक ज्योतिष” वाली छवि किसी एक बयान या संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक लंबा, ठोस और दस्तावेज़ी राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड है। Rahul Gandhi पहले राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने कोविड की पहली लहर के दौरान, लॉकडाउन लागू होने के लगभग सवा महीने के भीतर ही चेतावनी दी थी कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को तत्काल बंद किया जाए और देश को लंबे लॉकडाउन के लिए मानसिक व आर्थिक रूप से तैयार किया जाए। उस समय Bharatiya Janata Party सरकार और उसके समर्थक तंत्र ने इस सुझाव का मज़ाक उड़ाया, लेकिन कुछ ही समय में सरकार को वही निर्णय मजबूरी में लेना पड़ा। इसी दौरान राहुल गांधी ने “आर्थिक सुनामी” की बात कहते हुए जनधन खातों में ₹6,000 प्रतिमाह सीधे डालने की मांग की और इसे “न्याय योजना” का नाम दिया। तब इसे अव्यावहारिक बताया गया, लेकिन कुछ ही महीनों में वही आर्थिक संकट देश ने महसूस किया और सरकार को प्रत्यक्ष नकद सहायता जैसी योजनाओं की ओर जाना पड़ा।
राफेल सौदे को लेकर भी राहुल गांधी ने जो सवाल उठाए, उन्हें शुरुआत में राजनीतिक शोर कहकर खारिज किया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से पूछा था कि रक्षा क्षेत्र में कोई अनुभव न रखने वाले Anil Ambani की कंपनी को ऑफसेट पार्टनर क्यों बनाया गया और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को क्यों दरकिनार किया गया। उस समय सरकार ने इसे “घोटाला नहीं” बताकर टालने की कोशिश की, लेकिन समय के साथ सौदे की प्रक्रिया, कीमतों में बदलाव, ऑफसेट चयन और अनिल अंबानी समूह की वित्तीय हालत से जुड़े तथ्य सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने। यह सवाल आज भी कायम है कि रणनीतिक रक्षा सौदे में चयन का आधार योग्यता थी या राजनीतिक निकटता।
कृषि कानूनों के मामले में भी राहुल गांधी की चेतावनी समय से पहले दर्ज हो चुकी थी। संसद में तीन कृषि कानून आने से लगभग तीन साल पहले ही उन्होंने कहा था कि सरकार खेती को कॉरपोरेट के हवाले करने जा रही है और इसका परिणाम बड़े किसान आंदोलन के रूप में सामने आएगा। उस समय भी उनकी बातों को अतिशयोक्ति कहा गया, लेकिन बाद में वही तीन काले कानून लाए गए और देश ने स्वतंत्र भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन देखा। राहुल गांधी ने तब साफ कहा था कि सरकार को ये कानून वापस लेने होंगे और किसानों से माफी मांगनी होगी। तमाम अकड़ और जिद के बावजूद, 11 महीने बाद Narendra Modi को राष्ट्र के नाम संबोधन में माफी मांगकर कानून वापस लेने पड़े—ठीक वैसा ही, जैसा राहुल गांधी ने पहले कहा था।
अडानी–मोदी गठजोड़ को लेकर राहुल गांधी की चेतावनियाँ भी इसी सिलसिले का हिस्सा हैं। उन्होंने बार-बार आरोप लगाया कि नीतियाँ इस तरह गढ़ी जा रही हैं, जिससे Adani Group को असाधारण लाभ मिले—चाहे वह एयरपोर्ट हों, बंदरगाह हों, कोयला खनन हो या ऊर्जा परियोजनाएँ। शुरुआत में इसे “राजनीतिक हमला” कहकर खारिज किया गया, लेकिन बाद में हिंडनबर्ग रिपोर्ट, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की जांच और घरेलू वित्तीय बहसों ने इन आरोपों को केवल बयान भर नहीं रहने दिया। यह सवाल और गहराया कि क्या सत्ता और कॉरपोरेट के बीच की निकटता नीति-निर्माण को प्रभावित कर रही है।
चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर भी राहुल गांधी की चेतावनियों को पहले हल्के में लिया गया। “चुनाव चोरी” के आरोप, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, EVM, फंडिंग और मीडिया मैनेजमेंट पर उठी बहस—सबको पहले पराजय का बहाना कहा गया। लेकिन समय के साथ यह विमर्श मुख्यधारा में आया। SIR (Special Intensive Revision) को लेकर उनकी चेतावनी कि यह मतदाता सूची से नाम हटाने का खेल है—खासकर गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित तबकों के खिलाफ—बाद में सामने आई शिकायतों और आंकड़ों से और मजबूत हुई।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी राहुल गांधी की चेतावनियाँ बार-बार सही साबित होती दिखीं—चाहे चीन सीमा का मुद्दा हो, रूस–यूक्रेन युद्ध का भारत पर असर हो या अमेरिका के साथ असंतुलित रिश्ते। उन्होंने लगातार कहा कि आत्मप्रचार और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति से देश चलता है। इसी पृष्ठभूमि में जब राहुल गांधी ने भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर पहले ही कहा था कि डील होगी, लेकिन उसकी शर्तें ट्रंप तय करेंगे और मोदी सरकार झुककर स्वीकार करेगी, तो इसे केवल विपक्षी बयान कहकर खारिज करना आसान नहीं रहा। क्योंकि अंततः घटनाक्रम उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दिया।
पिछले एक दशक का अनुभव बताता है कि राहुल गांधी की कई “अप्रिय” और “असुविधाजनक” चेतावनियाँ समय के साथ सच साबित होती गई हैं। यही कारण है कि आज उनकी बातों को हल्के में लेना महज़ राजनीतिक भूल नहीं, बल्कि इतिहास से आँख चुराने जैसा माना जा रहा है।




