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WATCH VIDEO — 13 करोड़ का सपना ट्रायल में ही टूटा: रोहतास रोपवे हादसे ने खोली बिहार सरकार के एक और भ्रष्टाचार की पोल

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समी अहमद | पटना 26 दिसंबर 2025

बिहार के रोहतास जिले में पर्यटन को नई ऊंचाई देने का दावा करने वाला रोहतासगढ़ किला–रोहितेश्वर धाम रोपवे प्रोजेक्ट उद्घाटन से पहले ही बिखर गया। करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से बना यह रोपवे 1 जनवरी से आम लोगों के लिए खोला जाना था, लेकिन 26 दिसंबर को हुए ट्रायल रन में ही पूरा सिस्टम जवाब दे गया। जिस परियोजना को विकास की पहचान बताया जा रहा था, वही अब सवालों और संदेहों के घेरे में खड़ी है।

प्रत्यक्षदर्शियों और आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, ट्रायल शुरू होते ही रोपवे के कुछ टावर और पिलर भार सहन नहीं कर पाए। कुछ ही पलों में चार ट्रॉली समेत एक टावर क्षतिग्रस्त हो गया और पूरा ढांचा धराशायी हो गया। यह महज़ एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि निर्माण की नींव पर सीधा सवाल है। राहत सिर्फ इतनी रही कि यह ट्रायल रन था—कोई यात्री मौजूद नहीं था। मौके पर काम कर रहे मजदूर और कर्मचारी बाल-बाल बच गए, किसी के घायल होने की सूचना नहीं है।

लेकिन हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर 13 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी यह परियोजना ट्रायल में ही क्यों टूट गई? क्या निर्माण सामग्री में कटौती हुई? क्या ठेकेदारी और निगरानी में लापरवाही बरती गई? या फिर कागज़ों में सब कुछ मजबूत दिखाकर ज़मीन पर घटिया काम किया गया? स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि सिस्टम में गहरी सड़ांध का संकेत है।

बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के इंजीनियरों ने जांच की बात कही है। उनका कहना है कि कोलकाता से विशेषज्ञों की एक टीम बुलाई जा रही है, जो पूरे प्रोजेक्ट की तकनीकी समीक्षा करेगी। तब तक रोपवे को पूरी तरह बंद रखा जाएगा और सुरक्षा की गारंटी मिलने से पहले इसे चालू नहीं किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगी, या फिर सच में जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी?

यह हादसा बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की उस पुरानी बीमारी को एक बार फिर उजागर करता है, जहां योजनाएं बड़ी होती हैं, घोषणाएं भारी होती हैं, लेकिन गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही अक्सर गायब रहती है। रोहतास जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल के लिए रोपवे एक सार्थक और उपयोगी पहल हो सकती थी, लेकिन अब यह परियोजना विकास के बजाय भ्रष्टाचार और लापरवाही की मिसाल बनती दिख रही है।

अब जनता यह जानना चाहती है कि 13 करोड़ रुपये का हिसाब कौन देगा, और क्या इस हादसे के लिए जिम्मेदार अफसरों, इंजीनियरों और ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी? क्योंकि यहां सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं टूटा है—यह जनता के भरोसे और टैक्स के पैसे का सवाल है, और उससे भी बड़ा सवाल लोगों की जान की सुरक्षा का।

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