महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 22 दिसंबर 2025
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदुओं को निशाना बनाकर की जा रही लगातार हिंसा और भीड़ द्वारा की गई हत्याओं पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) ने गहरी चिंता और आक्रोश जताया है। मंच ने दो टूक कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही ये घटनाएं किसी एक देश या समुदाय तक सीमित मामला नहीं हैं, बल्कि यह सीधे-सीधे पूरी मानवता के खिलाफ अपराध हैं, जिन्हें किसी भी तर्क या परिस्थिति में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा कि नफरत, हिंसा और भीड़तंत्र के सामने चुप रहना भी एक तरह से अपराध में भागीदार बनना है। मंच का मानना है कि यदि भारत के अल्पसंख्यक बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर खामोश रहते हैं, तो यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, आत्ममंथन का विषय भी है। ऐसे समय में चुप्पी नहीं, बल्कि साहस के साथ सच के पक्ष में खड़ा होना जरूरी है। मंच ने स्पष्ट किया कि हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि इंसानियत, समानता और न्याय जैसे मूल्यों की रक्षा हो सके और आने वाली पीढ़ियों को नफरत की विरासत न मिले।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक शाहिद सईद ने कहा कि बांग्लादेश से आ रही तस्वीरें बेहद डरावनी और बेचैन करने वाली हैं। सड़कों पर उग्र भीड़, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना, घरों और धार्मिक स्थलों पर हमले—ये सब यह दिखाते हैं कि वहां कानून का डर कमजोर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में भीड़ की हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। एक निर्दोष युवक की लिंचिंग केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती, बल्कि यह कानून, संविधान और इंसानियत पर सीधा हमला है। शाहिद सईद ने जोर देकर कहा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी होती है और इससे समझौता पूरे समाज को अराजकता की ओर ले जाता है।
मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला प्रमुख डॉ. शालिनी अली ने कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। डर के माहौल में जीना किसी भी इंसान के लिए अपमानजनक है। उन्होंने कहा कि धर्म या पहचान के नाम पर नफरत फैलाना समाज को अंदर से खोखला कर देता है। डॉ. शालिनी अली ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा को केवल आंतरिक मामला मानकर नजरअंदाज न करे, बल्कि इसे मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में गंभीरता से ले।
राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शाहिद अख्तर, जो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं, ने कहा कि किसी भी देश की असली परीक्षा यही होती है कि वह अपने अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह शिक्षा, सह-अस्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह हिंसा आने वाली पीढ़ियों के लिए और गहरी दरारें छोड़ जाएगी।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा कि हालिया घटनाओं के पीछे बांग्लादेश में बढ़ता राजनीतिक अस्थिरता का माहौल भी एक बड़ा कारण है। युवा छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद जिस तरह से हिंसा भड़की, उसने हालात को और गंभीर बना दिया। ढाका और चटगांव जैसे शहरों में मीडिया संस्थानों पर हमले, भारतीय संस्थानों को निशाना बनाना और अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले यह दिखाते हैं कि गुस्सा अब अंधी हिंसा में बदल चुका है। इस हिंसा का सबसे आसान शिकार अल्पसंख्यक समुदाय बन रहा है, जो पहले से ही असुरक्षा के साए में जी रहा है।
मंच ने यह भी कहा कि अंतरिम सरकार द्वारा सेना की तैनाती और शांति की अपील जरूरी कदम हैं, लेकिन केवल अपीलों से हालात नहीं सुधरेंगे। ज़मीनी स्तर पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना और नफरत फैलाने वालों पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है। आने वाले चुनावों को देखते हुए अगर हिंसा और भारत-विरोधी उन्माद को राजनीतिक हथियार बनाया गया, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता और अल्पसंख्यकों को ही होगा।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने भारत सरकार से भी अपील की कि वह एक जिम्मेदार पड़ोसी देश के रूप में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा मजबूती से उठाए। यह सिर्फ कूटनीतिक मसला नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी का सवाल है। मंच का कहना है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और स्थिरता तभी संभव है, जब हर देश अपने यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों को बिना डर और भेदभाव के जीने का अधिकार दे।




