अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/बर्लिन | 3 मई 2026
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के एक फैसले ने एक बार फिर ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा समीकरण को चर्चा में ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका जर्मनी में तैनात अपने करीब 5000 सैनिकों को वापस बुलाने की योजना पर काम कर रहा है। इस फैसले को लेकर यूरोपीय देशों में चिंता बढ़ गई है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
यह कदम अमेरिकी सैन्य तैनाती के पुनर्गठन का हिस्सा बताया जा रहा है। लंबे समय से अमेरिका अपने वैश्विक सैन्य संसाधनों को नई रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, जर्मनी से सैनिकों की संख्या घटाने के फैसले को यूरोप में अलग नजर से देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का भी अहम हिस्सा है। ऐसे में सैनिकों की वापसी से नाटो की सामरिक तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता पर असर पड़ सकता है।
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात—खासतौर पर रूस-यूक्रेन संघर्ष और पूर्वी यूरोप में बढ़ती अस्थिरता—के बीच इस तरह का कदम समय से पहले और जोखिम भरा हो सकता है। उनका मानना है कि अमेरिका की सैन्य उपस्थिति यूरोप में एक स्थिरता कारक के रूप में काम करती रही है।
अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि यह फैसला संसाधनों के बेहतर उपयोग और नई रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता है, जिसके चलते यूरोप में सैन्य तैनाती को सीमित किया जा रहा है।
जर्मनी में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी दशकों पुरानी है और शीत युद्ध के दौर से ही यह यूरोप की सुरक्षा संरचना का एक अहम हिस्सा रही है। ऐसे में इस संख्या में कमी को प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों रूपों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस कदम से अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों के बीच भरोसे पर असर पड़ सकता है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका नाटो के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा और सहयोगी देशों के साथ मिलकर सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा।
जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों की संभावित वापसी ने यूरोप में सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस फैसले का नाटो की सामूहिक रणनीति और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ता है।




