अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल की आपूर्ति से जुड़ा समझौता घोषित किया है। इस फैसले ने अमेरिकी नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यही वॉशिंगटन अब तक रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी देता रहा है। अमेरिका का तर्क रहा है कि रूस से तेल खरीदकर भारत यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को को आर्थिक मदद पहुंचा रहा है। लेकिन अब रूस से डीजल की बड़ी खेप अमेरिका और वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर सहमति ने इस तर्क की एकरूपता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिका ने पिछले वर्ष भारत पर अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ लगाए थे। इसके अलावा, हाल में पारित एक कानून ने ट्रंप को रूस की ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया है। अमेरिकी प्रशासन की दलील रही है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई यूक्रेन के खिलाफ उसके युद्ध को जारी रखने में मदद करती है। भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर इसी आधार पर वॉशिंगटन लगातार दबाव बनाता रहा है।
लेकिन रूस से डीजल खरीदने के लिए अमेरिका की अपनी पहल ने इस नीति को लेकर असहज सवाल पैदा कर दिए हैं। यदि रूस की ऊर्जा खरीद से मिलने वाला राजस्व युद्ध को समर्थन देने का आधार माना जाता है, तो फिर अमेरिकी बाजार के लिए रूसी डीजल की आपूर्ति को किस तर्क से उचित ठहराया जाएगा? क्या एक ही खरीद को भारत के मामले में दंडात्मक कार्रवाई का आधार और अमेरिका के मामले में व्यावसायिक समझौता माना जा सकता है?
ट्रंप के इस कदम का असर केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं है। रूस की ऊर्जा बिक्री पर प्रतिबंधों और दबाव की नीति की विश्वसनीयता भी इससे जुड़ती है। यदि अमेरिका अपने हितों के अनुरूप रूस से ऊर्जा खरीदने या उसकी आपूर्ति की व्यवस्था करने का रास्ता अपनाता है, तो दूसरे देशों पर समान गतिविधियों के लिए दबाव बनाने की नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था और भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद की शर्तें एक जैसी हैं या नहीं, इसका आकलन समझौते की पूरी जानकारी, भुगतान व्यवस्था और लागू प्रतिबंधों के आधार पर ही किया जा सकता है। फिर भी, ट्रंप की घोषणा ने ऊर्जा व्यापार और रूस पर दबाव बनाने की अमेरिकी नीति के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास की बहस को तेज कर दिया है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूसी तेल की खरीद लंबे समय से उसकी ऊर्जा सुरक्षा, आयात लागत और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन का विषय रही है। अब सवाल यह है कि क्या वॉशिंगटन भारत से वही अपेक्षा करेगा, जिसका पालन वह अपने ऊर्जा हितों के मामले में खुद करने को तैयार है।
मुख्य सवाल यही है: रूस से ऊर्जा खरीदने पर भारत को टैरिफ की धमकी और अमेरिका के लिए रूसी डीजल की आपूर्ति का समझौता—क्या यह एक समान नियम है, या ऊर्जा और भू-राजनीति में अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग पैमाने अपनाए जा रहे हैं?



