महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025
संसद का शीतकालीन सत्र हर बार की तरह इस बार भी शोर-शराबे, नारेबाज़ी और विपक्ष–सरकार के टकराव का अखाड़ा बन गया है। सोमवार को शुरू हुए सत्र में विपक्ष ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को “वोट चोरी का हथकंडा” बताते हुए इतना ज़ोरदार विरोध किया कि लोकसभा को दो बार स्थगित करना पड़ा और अंततः पूरे दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया। मंगलवार को स्थिति और भी खराब रही—सदन शुरू होते ही विपक्ष के नारे गूँजने लगे और कुछ ही मिनटों में लोकसभा फिर से स्थगित। नतीजा यह कि संसद का बेहद कीमती समय फिर वही पुराने राजनीतिक संघर्ष की भेंट चढ़ गया।
पिछले मानसून सत्र का अनुभव भी कुछ अलग नहीं था। SIR, ऑपरेशन सिंदूर और स्पेस प्रोग्राम जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की मांग के बीच दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ और उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित हुई। 21 दिनों के सत्र में लोकसभा को 126 घंटे काम करना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 37.1 घंटे ही काम हो पाया। इसी तरह राज्यसभा में 49.9 घंटे ही काम हुआ, जबकि अपेक्षित समय 126 घंटे था। यानी लोकसभा में 88.9 घंटे और राज्यसभा में 76.1 घंटे सिर्फ हंगामे, नारेबाज़ी और स्थगन में निकल गए।
समय के साथ-साथ जनता का पैसा भी उतनी ही तेज़ी से बह रहा है। पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल के अनुसार लोकसभा को एक मिनट चलाने में 2.5 लाख रुपये और राज्यसभा को 1.25 लाख रुपये का खर्च आता है। इस हिसाब से लोकसभा में एक घंटे का खर्च 1.5 करोड़ और राज्यसभा में 75 लाख रुपये बैठता है। सिर्फ मानसून सत्र में ही लोकसभा में 133.35 करोड़ और राज्यसभा में 57 करोड़ से अधिक रुपये हंगामे में स्वाहा हो गए। कुल मिलाकर 190 करोड़ 42.5 लाख रुपये—जनता की गाढ़ी कमाई—बहस के बिना, नीति निर्माण के बिना, सिर्फ टकराव और शोरगुल में चली गई।
शीतकालीन सत्र की शुरुआत भी इसी रास्ते पर है। सोमवार को श्रद्धांजलि के बाद ही SIR को लेकर नारेबाज़ी शुरू हो गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मणिपुर जीएसटी संशोधन बिल पेश कर उसे पास करवाया, लेकिन बाकी दिन का कामकाज रुक गया। राज्यसभा में भी विपक्ष SIR को लेकर वॉकआउट करता रहा। मंगलवार को तो सदन शुरू होते ही ठप हो गया—विपक्ष अभी भी यही कह रहा है कि SIR को “वोटर लिस्ट हेरफेर” का तरीका बनाया जा रहा है, जबकि सरकार चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष की शर्तें मानने को तैयार नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस शीतकालीन सत्र का भविष्य भी मानसून सत्र जैसा ही दिख रहा है। विपक्ष और सरकार दोनों अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हैं—एक चर्चा की टाइमलाइन चाहता है, दूसरा बिना किसी शर्त के चर्चा को आगे बढ़ाना। इस tug-of-war में जो सबसे ज़्यादा नुकसान उठा रहा है, वह है देश का लोकतांत्रिक कामकाज और जनता का पैसा।
देश के सामने खड़ी आर्थिक चुनौतियों, विदेश नीति की पेचीदगियों, और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर गंभीर बहस की जरूरत है। लेकिन सदनों में बहस की जगह हंगामा है, संवाद की जगह टकराव है, और नीति निर्माण की जगह राजनीति की होड़। संसद चलती है तो देश चलता है—लेकिन फिलहाल देश की संसद रुक-रुककर चल रही है, और उसके साथ रुक रहा है लोकतांत्रिक कामकाज का पूरा पहिया।




