नई दिल्ली/ गुवाहाटी 29 अक्टूबर 2025
असम का इतिहास एक बार फिर अपने सबसे दर्दनाक और भयावह अध्याय, 18 फरवरी 1983 को हुए नेल्ली नरसंहार की ओर लौट आया है, जिसे देश की आज़ादी के बाद की सबसे खूनी घटनाओं में गिना जाता है, जहाँ नेल्ली और आसपास के 14 गाँवों में अनुमानित दो से तीन हजार लोगों—जिनमें अधिकांश बंगाली मूल के मुसलमान, महिलाएँ और बच्चे शामिल थे—की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई थी, और अब 42 साल बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा उस घटना की जाँच करने वाले तिवारी आयोग की 600 पेज की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का निर्णय लिया गया है।
1983 के असम आंदोलन के चरम पर यह नरसंहार “विदेशी” यानी बांग्लादेशी प्रवासियों को निकालने की मांग के उग्र रूप लेने का परिणाम था, जहाँ सरकारी आंकड़ों में 1,819 मौतें दर्ज हैं, लेकिन स्थानीय लोग 3,000 से अधिक मौतों का दावा करते हैं, और यह दुखद तथ्य है कि पुलिस अधिकारी की चेतावनी के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, और बाद में 688 मुकदमे दर्ज होने, 310 में चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद, सभी केस बंद कर दिए गए और पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला।
मुख्यमंत्री हिमंत सरमा के इस कदम को, जिसे वह “सच्चाई उजागर करने” और “इतिहास का हिस्सा” बताने का प्रयास बता रहे हैं, उस समय उठाया गया है जब राज्य में CAA, NRC और अवैध प्रवासन जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं, जिसके कारण विपक्ष और सामाजिक संगठन इसे चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का कारण बनने की आशंका जता रहे हैं।
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने जहाँ इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे “इतिहास को छिपाने का अपराध” बताया है, वहीं कांग्रेस नेता गौरी शंकर शर्मा ने इसे “वोट बैंक की राजनीति” और सरकार द्वारा अपनी असफलताओं से ध्यान हटाने का प्रयास करार दिया है; साथ ही फिल्मकार पार्थजित बरुआ जैसे लोगों ने भी चेतावनी दी है कि “पुरानी नफरत को दोबारा हवा देना खतरनाक होगा।”
जापानी इतिहासकार मकिको किमुरा की किताब “The Nellie Massacre of 1983” के अनुसार, यह हिंसा केवल सांप्रदायिक नहीं, बल्कि ज़मीन और सत्ता के लालच से भी प्रेरित थी, और काउंटरकरेंट्स पत्रिका के विश्लेषण के अनुसार, रिपोर्ट पेश करने से पहले माहौल को संवेदनशील बनाया जा रहा है, जिससे दशकों से कायम नाजुक सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है।
यह नरसंहार असम के “विदेशी नागरिक” विवाद की जड़ में है, जो 1971 के बाद आए शरणार्थियों द्वारा जनसांख्यिकीय संतुलन बदलने से उत्पन्न हुआ था और यही संघर्ष आज NRC और CAA के रूप में सामने है; इसलिए राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सरकार की यह नीति एक ओर बहुसंख्यक असमिया भावनाओं को साधती है, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यकों में भय पैदा करती है।
नेल्ली नरसंहार की रिपोर्ट का सार्वजनिक होना इतिहास की पारदर्शिता के लिए एक अहम कदम हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही गंभीर सामाजिक और राजनीतिक जोखिम भी जुड़े हैं; क्योंकि पीड़ितों के परिवार आज भी न्याय और मुआवज़े की प्रतीक्षा में हैं, और सवाल यह है कि क्या यह रिपोर्ट उन्हें इंसाफ दिलाएगी, या केवल पुराने घावों को फिर से हरा करके राज्य को सुलह और विकास के मार्ग से भटकाकर राजनीति की आग में झोंक देगी।




