शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अगस्त 2026
जामिया हमदर्द में पूर्व कुलपति डॉ. अफशार आलम के कार्यकाल को लेकर कथित प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद विश्वविद्यालय की व्यवस्था सवालों के घेरे में है। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के रूप में अपनी पहचान बताने वाले एक समूह ने 5 अगस्त 2026 को UGC अध्यक्ष को पत्र भेजकर पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। कर्मचारियों के अनुसार, डॉ. अफशार आलम ने 19 जून 2021 से 18 जून 2026 तक कुलपति के रूप में कार्य किया और इस दौरान लिए गए कई प्रशासनिक तथा वित्तीय फैसलों की विस्तृत जांच जरूरी है। शिकायत में पूर्व डिप्टी रजिस्ट्रार सरफराज अहसन और असिस्टेंट रजिस्ट्रार एवं PRO तौहीद आलम से जुड़े फैसलों को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। कर्मचारियों ने साफ तौर पर कहा है कि मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए या तो फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी गठित की जाए या CBI जांच कराई जाए।
नियुक्तियों पर बड़ा सवाल—किसे मिली नौकरी और किस आधार पर?
शिकायत में सबसे गंभीर सवाल विश्वविद्यालय में हुई नियुक्तियों को लेकर उठाया गया है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि पूर्व कुलपति के कार्यकाल के दौरान विभिन्न पदों पर उनके रिश्तेदारों और करीबी लोगों को नियुक्त किया गया। विशेष रूप से तौहीद आलम की असिस्टेंट रजिस्ट्रार और PRO के पद पर नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि तौहीद आलम का पूर्व कुलपति के परिवार से संबंध है। ऐसे में कर्मचारियों की मांग है कि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया की जांच हो—किस पद के लिए विज्ञापन निकला, कितने उम्मीदवारों ने आवेदन किया, चयन समिति में कौन-कौन शामिल था, पात्रता क्या थी और अंतिम नियुक्ति किस आधार पर की गई।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर नियुक्तियां पूरी तरह नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुईं, तो दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से स्थिति साफ होने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? और अगर जांच में नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो फिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी? हालांकि, ये आरोप शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए हैं और स्वतंत्र जांच में अभी साबित नहीं हुए हैं। उपलब्ध शिकायत में डॉ. अफशार आलम, सरफराज अहसन या तौहीद आलम का पक्ष दर्ज नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष से पहले संबंधित व्यक्तियों का जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
सरफराज अहसन की भूमिका पर भी उठे सवाल
शिकायत में पूर्व डिप्टी रजिस्ट्रार सरफराज अहसन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कर्मचारियों ने नियुक्तियों की प्रक्रिया के अलावा जामिया हमदर्द सोसाइटी से जुड़े रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की जांच की मांग की है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पूर्व कुलपति के कार्यकाल में हुई नियमित और संविदा नियुक्तियों का व्यापक रिकॉर्ड परीक्षण होना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या सभी प्रक्रियाएं विश्वविद्यालय के निर्धारित नियमों और उपनियमों के अनुसार पूरी की गई थीं।
ऐसे में जांच के दौरान चयन समितियों की कार्यवाही, नियुक्ति आदेश, पात्रता प्रमाणपत्र, आवेदन रिकॉर्ड, संबंधित फाइलों और प्रशासनिक अनुमोदनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि रिकॉर्ड में कोई विसंगति सामने आती है तो उससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि फैसला किस स्तर पर लिया गया और उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी। लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई अनियमितता वास्तव में हुई है।
KPMG से Deloitte तक वित्तीय काम आउटसोर्स करने पर सवाल
कर्मचारियों की शिकायत में विश्वविद्यालय के वित्तीय कामकाज की आउटसोर्सिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पत्र के अनुसार, विश्वविद्यालय के वित्त से जुड़े कार्य पहले KPMG और बाद में Deloitte को आउटसोर्स किए गए। शिकायतकर्ताओं ने इस व्यवस्था की जांच की मांग करते हुए सवाल उठाया है कि वित्तीय कामकाज को बाहरी संस्थाओं को सौंपने का फैसला किस प्रक्रिया के तहत लिया गया और इसका विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण तथा वित्तीय व्यवस्था पर क्या असर पड़ा।
यहां जांच के दौरान कई दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे—आउटसोर्सिंग का प्रस्ताव, प्रशासनिक मंजूरी, टेंडर या चयन प्रक्रिया, अनुबंध की शर्तें, भुगतान और उससे संबंधित फाइलें। सवाल यह भी है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के नियमों और वित्तीय प्रावधानों का पालन किया गया था। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ, तो रिकॉर्ड इसकी पुष्टि कर सकते हैं; और अगर कोई गड़बड़ी हुई, तो वही रिकॉर्ड जिम्मेदारी तय करने में अहम साबित होंगे।
चांसलर की नियुक्ति भी सवालों के घेरे में
शिकायत में जामिया हमदर्द के चांसलर की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि नियुक्ति विश्वविद्यालय की सोसाइटी के नियमों और उपनियमों के अनुरूप नहीं हुई। उन्होंने UGC से नियुक्ति प्रक्रिया और उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है।
किसी विश्वविद्यालय में चांसलर जैसे महत्वपूर्ण पद की नियुक्ति केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का मामला नहीं होती, बल्कि वह संस्थान के प्रशासनिक ढांचे और उसकी निर्णय प्रक्रिया से भी जुड़ी होती है। इसलिए शिकायतकर्ताओं का कहना है कि संबंधित नियमों, सोसाइटी के उपनियमों और नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।
कथित पुराने CBI मामले का भी शिकायत में जिक्र
कर्मचारियों ने अपनी शिकायत में डॉ. अफशार आलम के खिलाफ CBI के चेन्नई कार्यालय में कथित रूप से लंबित मामले का भी उल्लेख किया है। पत्र में Case No. RC.MAI: 2009.A.0056 का हवाला देते हुए भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ताओं ने इस कथित मामले का हवाला देते हुए मौजूदा शिकायत की स्वतंत्र जांच की मांग को और मजबूत करने की कोशिश की है।
हालांकि, इस मामले की वर्तमान स्थिति और इसमें लगाए गए आरोपों का अंतिम कानूनी निष्कर्ष उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे भी शिकायतकर्ताओं के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि किसी अपराध या भ्रष्टाचार के सिद्ध होने के रूप में। इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड या सक्षम जांच एजेंसी से ही स्पष्ट हो सकती है।
अब UGC के पाले में गेंद—जांच होगी या शिकायत फाइलों में दब जाएगी?
कर्मचारियों ने UGC के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे हैं—स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी या CBI जांच। उनकी मांग है कि पूर्व कुलपति के कार्यकाल में हुई नियमित और संविदा नियुक्तियों, वित्तीय फैसलों, आउटसोर्सिंग, सोसाइटी से जुड़े रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों की गहराई से जांच की जाए।
अब सवाल यह है कि UGC इस शिकायत को किस गंभीरता से लेता है। क्या आयोग शिकायतकर्ताओं से दस्तावेज मांगेगा? क्या पूर्व और वर्तमान अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा? क्या नियुक्तियों और वित्तीय फैसलों का स्वतंत्र ऑडिट होगा? क्या संबंधित फाइलों और सोसाइटी के रिकॉर्ड की जांच होगी? या फिर यह शिकायत भी अन्य प्रशासनिक शिकायतों की तरह कागजों में ही सिमट जाएगी?
आरोपों की सच्चाई जांच से ही सामने आएगी
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायत में लगाए गए आरोप अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुए हैं। डॉ. अफशार आलम, सरफराज अहसन और तौहीद आलम का पक्ष भी उपलब्ध शिकायत में दर्ज नहीं है। इसलिए आरोपों को तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। लेकिन यही कारण है कि कर्मचारियों की मांग की गई स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि आरोप गलत हैं तो जांच संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट रूप से आरोपों से मुक्त कर सकती है। और यदि दस्तावेजों में नियमों के उल्लंघन, वित्तीय अनियमितता या प्रशासनिक गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने का आधार भी मिलेगा। यानी इस विवाद का सबसे निष्पक्ष रास्ता जांच ही है।
जामिया हमदर्द जैसे उच्च शिक्षण संस्थान में प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही का सवाल केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रहता। विश्वविद्यालय के संसाधनों, नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों का सीधा असर छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों पर पड़ता है। ऐसे में संस्थान की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि गंभीर शिकायतों को न तो राजनीतिक या व्यक्तिगत विवाद मानकर नजरअंदाज किया जाए और न ही बिना जांच के आरोपों को सच मान लिया जाए।
अब निगाहें UGC की अगली कार्रवाई पर हैं। क्या आयोग स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग जांच शुरू करेगा? क्या CBI जांच की मांग पर विचार होगा? और क्या नियुक्तियों, वित्तीय फैसलों तथा प्रशासनिक रिकॉर्ड की परतें खोली जाएंगी?
फिलहाल सवाल कई हैं, आरोप गंभीर हैं और जवाब जांच से ही मिलेंगे। असली परीक्षा अब UGC की है—क्या वह इन सवालों का सामना करेगा या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा?




