— प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली | 22 फरवरी 2026
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को भारत के लिए एक ऐसे अवसर के रूप में देखा जा रहा था, जो देश को तकनीकी महाशक्ति बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता था। देश में इंजीनियरों, डेटा वैज्ञानिकों और स्टार्टअप्स की बड़ी संख्या होने के कारण उम्मीद थी कि भारत पश्चिमी देशों को चुनौती देने की स्थिति में पहुंचेगा। लेकिन हाल की घटनाओं ने यह दिखाया कि बड़े सपनों और वास्तविक तैयारी के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।
एआई से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को भारत की तकनीकी ताकत दिखाने का मंच माना जा रहा था, लेकिन अव्यवस्था, कम भागीदारी और स्पष्ट नतीजों की कमी ने यह संकेत दिया कि व्यवस्था अभी भी योजना, समन्वय और जवाबदेही जैसी बुनियादी बातों से जूझ रही है। यह केवल एक आयोजन की कमजोरी नहीं, बल्कि देश की तकनीकी छवि पर असर डालने वाली बात भी है।
एक विवादित घटना, जिसमें एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा चीनी रोबोट को अपना बताकर प्रदर्शित करने का मामला सामने आया, ने शिक्षा और शोध की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े किए। यह चिंता बढ़ाता है कि वास्तविक अनुसंधान और नवाचार के बजाय दिखावे और प्रमाणपत्रों की संस्कृति कहीं अधिक हावी होती जा रही है।
प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत मानव-केंद्रित तकनीकी दृष्टि — जिसमें एआई को मानवता और सामाजिक हित से जोड़ने की बात कही गई — एक सकारात्मक और भरोसा देने वाला विचार है। लेकिन केवल दृष्टि और घोषणाएं पर्याप्त नहीं होतीं। मजबूत घरेलू क्षमता और वास्तविक तकनीकी विकास के बिना ऐसे विचार प्रभावी परिणाम नहीं दे पाते।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत अभी एआई का निर्माता कम और उपभोक्ता अधिक है। देश की कई प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थाओं में भी मौलिक शोध और उन्नत प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी महसूस की जाती है। एआई जैसी तकनीक यदि बिना सावधानी अपनाए तेजी से बढ़ती है, तो इससे बड़े कॉरपोरेट एकाधिकार, संसाधनों पर दबाव और रोजगार पर नकारात्मक असर जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
वित्तीय दृष्टि से भी यह सवाल महत्वपूर्ण है। एआई एक महंगी तकनीक है, जिसमें भारी निवेश, ऊर्जा खपत और लंबे समय तक अनिश्चित लाभ की संभावना रहती है। सीमित संसाधनों वाले देश के लिए यह आवश्यक है कि वह निवेश और लाभ के बीच संतुलन बनाए। केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दबाव में अंधाधुंध निवेश आर्थिक दबाव और मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है।
रोजगार के संदर्भ में भी चिंता व्यक्त की जा रही है कि यदि तकनीक तेजी से अपनाई गई तो कुछ क्षेत्रों में नौकरियों की संख्या घट सकती है। ऐसे में विकास का मॉडल संतुलित होना चाहिए, ताकि तकनीकी प्रगति के साथ रोजगार और सामाजिक स्थिरता भी बनी रहे।
एक और महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी संप्रभुता का है। आज भारत का अधिकांश डिजिटल ढांचा विदेशी क्लाउड सेवाओं, चिप डिजाइन और सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर निर्भर है। यदि यह स्थिति बनी रहती है तो देश तकनीक का उपभोक्ता तो रहेगा, लेकिन नियंत्रण और लाभ का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाएगा। इससे डेटा, मुनाफा और रणनीतिक नियंत्रण — तीनों पर निर्भरता बढ़ सकती है।
तकनीक के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए यह भी समझना जरूरी है कि एल्गोरिदम अब केवल तकनीकी उपकरण नहीं रहे। वे लोगों की जानकारी, खरीदारी, वित्तीय निर्णय और सार्वजनिक विमर्श तक को प्रभावित करते हैं। यदि इन प्रणालियों का स्वामित्व और नियंत्रण बाहरी संस्थाओं के पास होगा, तो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को प्रभावित होने का खतरा बना रहेगा।
इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि देश घरेलू डेटा केंद्रों, भारतीय भाषाओं पर आधारित तकनीकी मॉडल, स्वदेशी चिप निर्माण और स्थानीय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ध्यान दे। निवेश केवल मोबाइल ऐप या सेवा आधारित कारोबार तक सीमित न रहकर गहरे तकनीकी अनुसंधान और विनिर्माण तक पहुंचना चाहिए।
सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा और शोध संस्थानों से जुड़ी है। विश्वविद्यालयों को नवाचार का केंद्र होना चाहिए, लेकिन अक्सर शोध की गुणवत्ता, प्रयोगशाला संसाधनों और उद्योग सहयोग की कमी सामने आती है। यदि उच्च शिक्षा संस्थान मजबूत शोध नहीं कर पाएंगे, तो निजी उद्योग भी विदेशी तकनीक पर निर्भर रहेगा और प्रतिभाशाली युवाओं का पलायन जारी रहेगा।
एआई को न तो अंधी दौड़ के रूप में अपनाना चाहिए और न ही पूरी तरह नजरअंदाज करना चाहिए। यह एक शक्तिशाली उपकरण है, जो सही उपयोग पर समाज के लिए लाभकारी और गलत उपयोग पर असमानता व नियंत्रण की समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात संतुलन, समझ और आत्मनिर्भरता है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि भारत एआई की दौड़ जीतता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या देश अपने निर्णय लेने की क्षमता और तकनीकी स्वतंत्रता को बनाए रख पाता है। यदि कोई राष्ट्र केवल तकनीक आयात करता है और खुद क्षमता विकसित नहीं करता, तो वह आधुनिक तो दिख सकता है, लेकिन दीर्घकाल में निर्भर हो जाता है।
भारत के लिए सही रास्ता यही है कि वह उत्साह के साथ, लेकिन सावधानी और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े — ताकि तकनीक देश की सेवा करे, देश तकनीक का नहीं।




