महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 2 जनवरी 2025
KKR–बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद में बेतुका हमला, असली हक़दार बीसीसीआई
आईपीएल और कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) से जुड़े एक मामूली क्रिकेटीय तथ्य को लेकर उमेर इलियासी ने जिस तरह शाहरुख खान पर हमला बोला है, वह न सिर्फ गैर-ज़िम्मेदाराना है बल्कि साफ़ तौर पर सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश भी दिखता है। खुद को इमाम संगठन का प्रमुख बताने वाले उमेर इलियासी ने शाहरुख खान से “देशवासियों से माफी” मांगने तक की बात कह दी और उन्हें देशविरोधी ठहराने का दुस्साहस किया। सवाल यह है कि क्या वाकई यह बयान किसी समझ से उपजा है या फिर ‘किंग खान’ का नाम इस्तेमाल कर अपनी लकीर बड़ी करने की एक नाकाम कोशिश है?
सबसे पहले यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि आईपीएल में किसी देश के खिलाड़ी को खेलने की अनुमति देना न तो शाहरुख खान का अधिकार है और न ही किसी फ्रेंचाइज़ी मालिक का मनमाना फैसला। आईपीएल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के अधीन चलने वाली लीग है। नियम, प्रतिबंध और पात्रता तय करने का पूरा अधिकार सिर्फ और सिर्फ बीसीसीआई और ज़रूरत पड़ने पर भारत सरकार का होता है। अगर पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा, तो वह शाहरुख खान के कहने से नहीं, बल्कि आधिकारिक नीति और राष्ट्रीय हालात के चलते लगा। ऐसे में बांग्लादेशी खिलाड़ी को लेकर शाहरुख खान को कटघरे में खड़ा करना सीधे-सीधे अज्ञानता या जानबूझकर फैलाया गया ज़हर है।
उमेर इलियासी की बातों में सबसे ज़्यादा खतरनाक पहलू यह है कि वह बिना किसी संवैधानिक या कानूनी आधार के “देशद्रोह” जैसे गंभीर शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या उन्हें यह भी याद है कि एक समय खुद KKR की टीम में पाकिस्तान के शोएब अख्तर खेले थे? उस वक्त न तो उमेर इलियासी की ज़ुबान चली, न किसी ने शाहरुख खान की देशभक्ति पर सवाल उठाया। जब पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा, तो शोएब अख्तर को भी टीम छोड़नी पड़ी—बिल्कुल वैसे ही जैसे नियम बदलने पर कोई भी खिलाड़ी बाहर होता है। यही प्रक्रिया है, यही नियम हैं।
असल में यह पूरा बयान क्रिकेट से ज़्यादा राजनीति और धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश लगता है। उमेर इलियासी जैसे लोग बार-बार यह साबित करते हैं कि उन्हें न खेल की समझ है, न संवैधानिक व्यवस्था की। उन्हें बस एक बड़ा नाम चाहिए—और भारत में शाहरुख खान से बड़ा नाम कौन सा हो सकता है? किंग खान पर हमला करो, मीडिया की सुर्खियां बटोरो, और खुद को किसी बड़े “रक्षक” की तरह पेश करो। यही इस पूरे प्रकरण की असली कहानी है।
यह भी समझना ज़रूरी है कि शाहरुख खान सिर्फ एक अभिनेता या फ्रेंचाइज़ी मालिक नहीं हैं, बल्कि एक वैश्विक पहचान हैं। उनका नाम भारत की सॉफ्ट पावर से जुड़ा है। ऐसे में बिना सोचे-समझे उन पर देशविरोधी होने का ठप्पा लगाना न केवल शर्मनाक है, बल्कि देश की छवि को भी नुकसान पहुंचाने वाला है। अगर आज बांग्लादेशी खिलाड़ी पर सवाल उठाया जाएगा, तो कल किसी और देश के खिलाड़ी पर—और फिर खेल ही नहीं बचेगा, सिर्फ नफरत रह जाएगी।
सच तो यह है कि अगर बांग्लादेश के खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगाना है, तो उमेर इलियासी को बयानबाज़ी छोड़कर बीसीसीआई या सरकार के दरवाज़े पर जाना चाहिए। लेकिन वहां शायद उनकी कोई सुनवाई न हो, क्योंकि वहां तर्क और नियम चलते हैं, भावनात्मक ड्रामा नहीं। इसलिए आसान रास्ता चुना गया—शाहरुख खान का नाम बदनाम करो, सोशल मीडिया में शोर मचाओ और खुद को प्रासंगिक दिखाओ।
यह खबर दरअसल शाहरुख खान के बारे में कम और उमेर इलियासी की सोच के बारे में ज़्यादा बताती है। किंग खान का नाम बदनाम करने चले लोग यह भूल जाते हैं कि देशभक्ति न तो फर्जी नारों से साबित होती है और न ही किसी खिलाड़ी की राष्ट्रीयता पर उंगली उठाकर। देशभक्ति जिम्मेदारी, समझ और संवैधानिक मर्यादा से दिखती है—और इस कसौटी पर उमेर इलियासी का बयान पूरी तरह फेल नजर आता है।




