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दो भारत: एक को ‘अमृतकाल’, दूसरे को ‘दर्द और दहशत काल’ — किसका विकास है यह?

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सुनील कुमार | नई दिल्ली 5 नवंबर 2025

“तुम अमीर हो ख़ुशनसीब हो

मैं गरीब हूँ बदनसीब हूँ

पि पि के जख्म अपने सिने दो

मुझको पीना है पीने दो

मुझको जीना है जीने दो…”

यह महज फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ नहीं, बल्कि आज के भारत की आत्मा की चीख हैं। एक कराह जो ग्लैमर, GDP और विकास के शोर में दबा दी जाती है। भारत आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ़ अमीरी की जगमगाती गगनचुंबी इमारतें हैं — ऊपर की मंज़िलों पर रहने वाले वे लोग जिन्हें दुनिया सलाम करती है — और दूसरी तरफ़ उसी शहर की झोपड़पट्टियों में रहने वाले करोड़ों लोग, जिनके सिर पर छत का भरोसा भी अक्सर टूट जाता है। यह विभाजन अब सिर्फ़ आर्थिक नहीं रहा — यह दो दुनियाओं का अस्तित्व है। एक वह जो जीत का जश्न मना रही है, दूसरा वह जो हार को नियति मानने पर मजबूर कर दिया गया है।

G20 के लिए जारी रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि भारत में शीर्ष 1% आबादी के पास राष्ट्रीय संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा पहुँच चुका है। उनका धन पिछले बीस वर्षों में 62% तक बढ़ गया। लेकिन यह चकाचौंध भरी प्रगति, ये आसमान छूते मुनाफ़े और यह कारपोरेट विजय-संगीत — सब तब बेमानी हो जाते हैं, जब उसी देश का एक बड़ा वर्ग बच्चों को दो वक़्त का दूध तक नहीं दे पाता। जब सस्ते अस्पताल की तलाश में लोग एक शहर से दूसरे शहर भटकते हुए जान गंवा देते हैं। जब डिग्री हाथ में लेकर लाखों युवा सड़क पर खड़े पूछते हों — “हमारी बारी कब?”

भारत में धन-संग्रह की गति इतनी तेज़ और असमान है कि Oxfam की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ पिछले एक दशक में ही देश के 100 अरबपतियों की संपत्ति 13 गुना से अधिक बढ़ गई है। वहीं, निचले तबके के 50% लोगों की आय में लगभग ठहराव रहा है। ऑपचारिक श्रम के घटते अवसर और असंगठित क्षेत्र की मजबूरी ने गरीबों को गरीबी के चक्र में और गहरा धकेला है। यह परिदृश्य स्पष्ट दिखाता है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ श्रम के हाथों में नहीं, बल्कि धन-निवेशकों की तिजोरियों में केंद्रित रहा है।

रोजगार के पैमाने पर तस्वीर और चिंताजनक है — सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के अनुसार देश में युवाओं (20–24 वर्ष) की बेरोज़गारी दर लगातार 40% के आसपास बनी हुई है। यह वह आयु-समूह है जिसे देश की विकास-इंजन माना जाता है, परंतु वे सड़कों पर अवसरों की तलाश में भटक रहे हैं। दूसरी ओर, 30 लाख सरकारी पद खाली पड़े हैं — पर राजनीतिक घोषणाओं और महंगे विज्ञापनों के बीच ये तथ्य दबा दिए जाते हैं।

शहरी-ग्रामीण विभाजन भी अब ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच चुका है। ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आमदनी मात्र ₹10,000 के आसपास है, वह भी कृषि आधारित जोखिमों पर पूरी तरह निर्भर। जबकि शहरी उच्च—मध्यवर्ग के मासिक व्यय शिविरों में यह संख्या 8-10 गुना तक पहुँच जाती है। इसका परिणाम यह हुआ है कि जहाँ एक भारत फैशन—फिटनेस—फूड कोर्ट की नई अर्थव्यवस्था बना रहा है, वहीं दूसरा भारत दाल के दाम देखकर सप्ताह का मेन्यू बदलने पर मजबूर है।

सरकार ने कहा — हमने विकास किया, दुनिया ने सराहा, रेकॉर्ड टूटे, आंकड़े चमके। सवाल यह है — किसके लिए किया? क्या विकास की धूप सबकी छतों पर बराबर पड़ी? या फिर यह धूप कुछ ऊँची दीवारों में कैद होकर एक ही वर्ग को तपती रोशनी देती रही? जब नीतियाँ पूँजी—मित्र हों और श्रमिक—उपेक्षित, तब समाज का संतुलन टूटता है। और आज यही हुआ है। मजदूर का पसीना सूखता है पर जेब नहीं भरती। किसान की फ़सल उगती है, पर उसका भविष्य नहीं उगता। शहरों में अवसर हैं, पर वही शहर सबसे अधिक भूखे पेट पैदा कर रहे हैं।

यह सच सिर्फ़ आँकड़ों की रिपोर्ट नहीं बता रही — यह सड़कों पर, खेतों में, निर्माण स्थलों पर, अस्पताल की कतारों में रोज़ दिख रहा है। एक वह भारत है जहाँ एक क्लिक से करोड़ों का व्यापार होता है — और दूसरा भारत वह है जिसे एक क्लिक पर राशन बंद हो जाने का डर रहता है। एक भारत बिना सोचे विदेश यात्रा करता है — दूसरे भारत ने अपना गाँव भी कभी नहीं देखा। एक भारत “अमृतकाल” में जी रहा है — और दूसरा “दर्दकाल” में तड़प रहा है।

लोकतंत्र की मज़बूती इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने अरबपति हैं — बल्कि इस बात से होती है कि कितने नागरिक सम्मान के साथ जी पा रहे हैं। आर्थिक खाई जितनी चौड़ी होगी, राजनीतिक असंतोष उतना गहरा होगा। यह असमानता सिर्फ़ गरीबी की समस्या नहीं — यह राष्ट्र की आत्मा पर चोट है। यह उस भरोसे को खा जाती है जिसकी वजह से लोग मतदान करते हैं, मेहनत करते हैं, सपने देखते हैं।

देश की दिशा बदलने के लिए अब नकली उत्सव नहीं, नीतिगत साहस चाहिए। विकास को जमीनी बनाना होगा — रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा पर भारी और ईमानदार निवेश। टैक्स—सिस्टम को न्यायपूर्ण बनाना होगा, ताकि देश की संपत्ति कुछ गिने-चुने हाथों में बंद हो जाने का सिलसिला रुके। अवसरों का दरवाज़ा सबके लिए खुले — वरना लोकतंत्र एक एलिट क्लब बन जाएगा, और संविधान की आत्मा मौन हो जाएगी।

क्योंकि अंत में राष्ट्र उस आख़िरी पंक्ति जैसा ही बनता है जिसे हमने सुनकर अनदेखा कर दिया…

“मुझको जीना है जीने दो…” अगर देश की नीतियाँ इस आवाज़ को नहीं सुनेंगी — तो इतिहास सुन लेगा कि भारत दो भारतों में टूट गया था। और उस बंटाधार पर सबसे काला धब्बा — उस दौर की सरकार के माथे पर दर्ज होगा।

सरकार मंचों पर विकास के डंके बजाती फिरती है, विश्वगुरु बनने का दावा करती है, और खुद की पीठ थपथपाकर बताती है कि देश आगे बढ़ रहा है। लेकिन क्या सचमुच? यह उसी देश की कहानी है जहाँ कभी कहा गया कि लगभग 21 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, इसलिए उन्हें राशन दिया जा रहा है ताकि भूख से बचाया जा सके। आज हालात यह हैं कि सरकार को गर्व से बताना पड़ता है कि वह 81 करोड़ भारतीयों को मुफ्त राशन दे रही है — यानी आधे से भी ज्यादा देश को भोजन की गारंटी पर जिंदा रखा जा रहा है। 

अगर विकास ने सच में दरवाज़े सबके लिए खोले होते, तो राशन सूची बढ़ती या घटती? सवाल यह है कि मोदी सरकार अपने “रिकॉर्ड” किस बात का मना रही है — गरीबी खत्म करने का या उसे सरकारी झोले में शिफ्ट कर देने का? क्योंकि यह आंकड़ा चीख-चीख कर बताता है कि रोटी आज भी इस देश में हक नहीं, भीख की श्रेणी में बांटी जा रही है — और इसे उपलब्धि बता कर पेश किया जा रहा है। वो भी पूरे अनादर और अहंकार के साथ। तभी तो अमित शाह को ये बोलते शर्म नहीं आई कि लोग हमारे 5 किलो राशन पर पल रहे हैं। और ऐसा कहते हुए वो ये भी भूल गए कि सरकार और अमित शाह खुद जनता के यानि टैक्सपेयर के पैसों से पल रहे हैं। 

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