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सच या सियासत? मोदी के बयान पर इतिहासकार का पलटवार — सरदार पटेल कश्मीर को पाकिस्तान जाने देने को थे तैयार

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नई दिल्ली, 1 नवंबर 2025 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती पर दिए गए बयान ने देश के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। मोदी ने राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर कहा था कि सरदार पटेल चाहते थे कि “पूरा कश्मीर भारत में शामिल हो, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं होने दी,” और उन्होंने खुद “अनुच्छेद 370 हटाकर पटेल का अधूरा सपना पूरा किया।” मोदी का यह बयान न केवल इतिहास की व्याख्या को लेकर सवाल खड़े करता है, बल्कि स्वतंत्र भारत के दो महान नेताओं — नेहरू और पटेल — के संबंधों को भी नए विवादों में खींच लाता है।

इतिहासकार और प्रोफेसर डॉ. जी. रामचंद्रन ने इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए प्रधानमंत्री पर इतिहास को विकृत करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा, “मोदी अपने नेहरू-विरोध में इतने अंधे हो गए हैं कि वह ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि सरदार पटेल की विरासत का राजनीतिक उपयोग किया जा सके। सत्य यह है कि सरदार पटेल कभी भी कश्मीर को लेकर उतने आक्रामक नहीं थे, जितना आज उन्हें दिखाया जा रहा है।”

डॉ. रामचंद्रन ने अपने लेख में पटेल के राजनीतिक सचिव वी. शंकर का हवाला देते हुए लिखा है कि “सरदार पटेल उस समय कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के निर्णय का सम्मान करने के पक्ष में थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अगर जम्मू-कश्मीर के शासक को लगे कि उनका और उनके राज्य का हित पाकिस्तान के साथ जुड़ने में है, तो वे उनके रास्ते में नहीं आएंगे।” यह बयान इस बात का संकेत है कि पटेल उस दौर में किसी वैचारिक कट्टरता से नहीं, बल्कि यथार्थवादी राजनीति से प्रेरित होकर निर्णय लेना चाहते थे।

इतिहासकार ने यह भी खुलासा किया कि पटेल और जिन्ना के बीच एक समझौते की संभावना भी बनी थी। उन्होंने लिखा, “अगर जिन्ना हैदराबाद और जूनागढ़ को भारत को छोड़ देते, तो पटेल कश्मीर को पाकिस्तान जाने देने पर विचार करने को तैयार थे। लेकिन जिन्ना ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, और वहीं से दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर स्थायी विवाद की नींव पड़ी।” डॉ. रामचंद्रन के अनुसार, यह ऐतिहासिक सच्चाई मोदी की उस व्याख्या से बिल्कुल अलग है जिसमें वे सरदार पटेल को “कश्मीर के सम्पूर्ण भारत में विलय” के एकमात्र नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इतिहासकार ने आगे लिखा कि पटेल अनुच्छेद 370 के निर्माण और कश्मीर को विशेष दर्जा देने की प्रक्रिया में भी पूरी तरह शामिल थे। उन्होंने संविधान सभा की उस बहस का उल्लेख किया जिसमें पटेल स्वयं इस बात पर सहमत थे कि कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया को संवेदनशीलता और संवाद के माध्यम से संभालना चाहिए, न कि दबाव या शक्ति के बल पर। रामचंद्रन ने लिखा, “यह मोदी सरकार की राजनीतिक सुविधा के लिए गढ़ी गई कथा है कि अनुच्छेद 370 ने भारत की एकता में बाधा डाली। दरअसल, यह उस दौर का राजनीतिक समझौता था, जिसने भारत को स्थिरता दी।”

अपने लेख में डॉ. रामचंद्रन ने मोदी सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाकर न केवल एक ऐतिहासिक व्यवस्था को समाप्त किया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा घटाकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया, जो लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध कदम था। उन्होंने लिखा, “यह कदम किसी स्थायी समाधान की दिशा में नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया निर्णय था, जिसने स्थानीय जनता में अविश्वास को और गहरा किया।”

अंत में इतिहासकार ने कहा कि सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू दोनों ही महान राष्ट्रनिर्माता थे, जिनका उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता था, न कि एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा। उन्होंने लिखा, “1947 से 1950 के बीच इन दोनों नेताओं ने भारत की सीमाओं, राज्यों और संस्थाओं को आकार दिया। आज की राजनीति में दोनों की तुलना कर उन्हें एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना इतिहास के साथ अन्याय है।”

डॉ. रामचंद्रन ने अपने लेख का समापन इन शब्दों में किया  “हम दोनों नेताओं को समान श्रद्धा के साथ नमन करते हैं। सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू, दोनों ने भारत को जो रूप दिया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। इतिहास को तोड़ा नहीं, जोड़ा जाना चाहिए।”

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज की राजनीति इतिहास का सहारा ले रही है या इतिहास को अपने हित में मोड़ रही है?

 

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