एबीसी नेशनल न्यूज | वॉशिंगटन/ नई दिल्ली | 22 फरवरी 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का फैसला केवल व्यापारिक नीति का बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ सकता है जिनकी अर्थव्यवस्था निर्यात पर काफी हद तक निर्भर है। भारत भी इनमें शामिल है। निवेशकों और शेयर बाजार के नजरिए से देखें तो यह फैसला अलग-अलग सेक्टर में अलग तरह की हलचल पैदा कर सकता है—कहीं दबाव, तो कहीं अवसर।
टेक्सटाइल शेयरों पर दबाव और ऑर्डर अनिश्चितता
भारतीय टेक्सटाइल और गारमेंट कंपनियों के लिए अमेरिका सबसे अहम बाजारों में से एक है। टैरिफ बढ़ने से अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं, जिससे ऑर्डर का कुछ हिस्सा वियतनाम, बांग्लादेश या लैटिन अमेरिकी देशों की ओर शिफ्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। शेयर बाजार में इसका असर निर्यात-आधारित टेक्सटाइल कंपनियों पर निवेशकों की सतर्कता के रूप में दिख सकता है। खासकर मिडकैप और स्मॉलकैप टेक्सटाइल शेयरों में उतार-चढ़ाव और मार्जिन दबाव की आशंका रहती है, क्योंकि ये कंपनियां कीमतों में बदलाव को आसानी से ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं।
इंजीनियरिंग और कैपिटल गुड्स कंपनियों के लिए मांग की चुनौती
इंजीनियरिंग, औद्योगिक उपकरण और धातु आधारित निर्यात करने वाली कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा की नई चुनौती खड़ी हो सकती है। टैरिफ बढ़ने से अमेरिकी आयातकों की लागत बढ़ेगी और वे स्थानीय या निकटवर्ती सप्लायर्स को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसका असर उन भारतीय कंपनियों के शेयरों पर दिख सकता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा निर्यात से आता है। हालांकि यदि चीन पर अधिक कड़े शुल्क लागू रहते हैं तो कुछ कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता के रूप में नए अवसर भी मिल सकते हैं, जिससे शेयरों में अस्थायी गिरावट के बाद रिकवरी की संभावना बनी रहती है।
ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में मार्जिन और वॉल्यूम दोनों पर असर
ऑटो कंपोनेंट कंपनियां अमेरिकी आफ्टरमार्केट में मजबूत पकड़ रखती हैं, लेकिन टैरिफ वृद्धि उनके लिए दोहरी चुनौती बन सकती है—पहली, कीमतों में बढ़ोतरी और दूसरी, ऑर्डर में संभावित कमी। इससे निर्यात-उन्मुख ऑटो पार्ट्स कंपनियों के शेयरों में अस्थिरता देखी जा सकती है। निवेशक आमतौर पर उन कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं जिनका घरेलू बाजार मजबूत हो या जिनकी वैश्विक उपस्थिति विविध हो, इसलिए सेक्टर के भीतर भी प्रदर्शन में अंतर देखने को मिल सकता है।
फार्मा शेयरों में सीमित असर लेकिन भावनात्मक उतार-चढ़ाव संभव
फार्मास्यूटिकल सेक्टर अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है क्योंकि अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं पर निर्भर करती है। फिर भी टैरिफ बढ़ने की खबर से शुरुआती चरण में फार्मा शेयरों में भावनात्मक उतार-चढ़ाव दिख सकता है। दीर्घकाल में बड़ी कंपनियां स्थानीय उत्पादन, अधिग्रहण या साझेदारी के माध्यम से जोखिम को संतुलित कर सकती हैं, जिससे सेक्टर में गिरावट सीमित रहने की संभावना रहती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी हार्डवेयर कंपनियों के सामने रणनीतिक बदलाव का दबाव
इलेक्ट्रॉनिक्स और हार्डवेयर निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए यह फैसला लागत बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। इससे अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन होगी और कंपनियों को स्थानीय असेंबली या साझेदारी मॉडल अपनाने पर विचार करना पड़ सकता है। शेयर बाजार में इस सेक्टर के निवेशक आमतौर पर नीति जोखिम को लेकर संवेदनशील रहते हैं, इसलिए खबरों के आधार पर तेज उतार-चढ़ाव संभव है। हालांकि सप्लाई चेन विविधीकरण के चलते भारत में निवेश बढ़ने की संभावना इस सेक्टर के लिए सकारात्मक कहानी भी बना सकती है।
केमिकल और स्पेशलिटी केमिकल कंपनियों के लिए जोखिम के साथ अवसर
स्पेशलिटी केमिकल सेक्टर पिछले कुछ वर्षों में चीन के विकल्प के रूप में उभरा है। यदि अमेरिकी नीति चीन से आयात को और महंगा बनाती है, तो भारतीय कंपनियों को बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। ऐसे परिदृश्य में इस सेक्टर के शेयर गिरावट के बजाय अपेक्षाकृत मजबूत भी रह सकते हैं। हालांकि वैश्विक मांग कमजोर होने पर कीमतों और निर्यात वॉल्यूम पर दबाव भी देखने को मिल सकता है।
कृषि और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों पर मांग संवेदनशीलता का असर
समुद्री उत्पाद, मसाले और प्रोसेस्ड फूड निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए कीमतों में मामूली वृद्धि भी मांग को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि यह मूल्य-संवेदनशील श्रेणी है। ऐसे में इस सेक्टर के शेयरों में धीरे-धीरे दबाव और निवेशकों की सतर्कता देखने को मिल सकती है। प्रीमियम और ब्रांडेड उत्पादों पर असर अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना रहती है।
बाजार की बड़ी तस्वीर: डर, अवसर और निवेशकों की रणनीति
समग्र रूप से देखें तो टैरिफ वृद्धि का असर भारतीय शेयर बाजार में सेक्टर-विशेष अस्थिरता के रूप में दिखाई दे सकता है। निर्यात-निर्भर कंपनियों में दबाव, जबकि घरेलू मांग और विविध वैश्विक उपस्थिति वाली कंपनियों में अपेक्षाकृत स्थिरता देखने को मिल सकती है। साथ ही “चीन प्लस वन” रणनीति और संभावित निवेश प्रवाह कुछ सेक्टरों—जैसे केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और डिफेंस सप्लाई चेन—के लिए सकारात्मक कहानी भी बना सकते हैं।
यह फैसला भारतीय निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर दोनों का संकेत है। बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि टैरिफ किस उत्पाद श्रेणी पर लागू होते हैं, अन्य देश कैसे प्रतिक्रिया देते हैं और भारतीय कंपनियां कितनी तेजी से अपनी रणनीति को बदल पाती हैं।




