एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली/वॉशिंगटन/कोपेनहेगन | 12 जनवरी 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ट्रंप ने कहा है कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करना उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी है और अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका इसे लोगों की मर्जी के बिना भी हासिल कर सकता है। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त इलाका है, जहां के लोगों की अपनी सरकार और पहचान है। ट्रंप के इस बयान के बाद यूरोप में चिंता और नाराज़गी दोनों साफ दिखाई दे रही हैं। यूरोपीय देशों का कहना है कि यह सोच खतरनाक है और इससे दुनिया में तनाव बढ़ सकता है।
ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड के आसपास रूस और चीन की मौजूदगी बढ़ रही है और इससे अमेरिका को खतरा हो सकता है। लेकिन डेनमार्क सरकार, ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार और यूरोप के दूसरे देशों ने इस दावे को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि फिलहाल वहां कोई ऐसा खतरा नहीं है, जैसा ट्रंप बता रहे हैं। इसके बावजूद व्हाइट हाउस ने यह माना है कि ट्रंप इस मामले में हर रास्ते पर सोच रहे हैं, यहां तक कि सैन्य ताकत के इस्तेमाल पर भी। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अभी जोर खरीद या बातचीत जैसे रास्तों पर ही है।
इस पूरे विवाद में एक और बात सामने आई है, जिसने लोगों को और हैरान कर दिया। खबर है कि ट्रंप प्रशासन ने यह भी सोचा है कि ग्रीनलैंड के लोगों को सीधे पैसे देकर मनाया जाए। यानी हर व्यक्ति को हजारों डॉलर दिए जाएं, ताकि वे डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो जाएं। यूरोप में इस विचार को अपमानजनक और गलत बताया जा रहा है। लोगों का कहना है कि किसी देश या समाज का भविष्य पैसों से नहीं खरीदा जा सकता।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने ट्रंप के बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ कहा कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर हमला किया तो यह NATO के लिए बहुत बड़ा संकट होगा। उन्होंने ट्रंप से ऐसी भाषा और धमकियां बंद करने को कहा। वहीं, ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसेन ने भी भावुक शब्दों में कहा, “अब बहुत हो गया। ग्रीनलैंड कोई सौदा नहीं है। यह ग्रीनलैंड के लोगों का घर है और फैसला भी वही करेंगे।”
यूरोप के कई बड़े देश—जैसे ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और इटली—एक साथ सामने आए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड का भविष्य सिर्फ वहां के लोग और डेनमार्क ही तय कर सकते हैं। किसी भी तरह का दबाव, धमकी या सैन्य कदम स्वीकार नहीं किया जाएगा। यूरोपीय देश अब यह भी सोच रहे हैं कि NATO के जरिए आर्कटिक इलाके में सुरक्षा बढ़ाई जाए, ताकि यह दिखाया जा सके कि सुरक्षा अकेले अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सबकी साझा जिम्मेदारी है।
ग्रीनलैंड इतना अहम इसलिए है क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और इसकी जगह बहुत रणनीतिक मानी जाती है। यहां कीमती खनिज, रेयर अर्थ मिनरल्स और यूरेनियम जैसे संसाधन मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघल रही है, जिससे इन संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है। अमेरिका की वहां पहले से एक सैन्य बेस है, लेकिन ट्रंप अब सिर्फ मौजूदगी नहीं, बल्कि पूरा नियंत्रण चाहते हैं—यही बात दुनिया को डरा रही है।
12 जनवरी 2026 तक कोई सैन्य कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन माहौल काफी तनावपूर्ण है। ट्रंप अपने बयान से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते, जबकि यूरोप बातचीत और शांति के रास्ते पर जोर दे रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर यह विवाद और बढ़ा, तो इससे अमेरिका और यूरोप के रिश्ते बिगड़ सकते हैं और NATO की एकता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। आज की दुनिया में ताकत और दबाव से नहीं, संवाद, समझ और इंसानियत से ही स्थायी शांति और सुरक्षा कायम रह सकती है।




