अंतरराष्ट्रीय डेस्क 2 जनवरी 2026
ईरान इस समय गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। महंगाई आसमान पर है, बेरोज़गारी बढ़ रही है और आम लोगों की ज़िंदगी दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में देश के कई हिस्सों में सरकार के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं। लोग सड़कों पर उतरकर रोटी, रोज़गार और सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हैं। हालात इतने संवेदनशील हो चुके हैं कि अब इस संकट में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भी खुली एंट्री हो गई है।डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ईरानी सरकार ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ज़ोर-जबरदस्ती की, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा। ट्रंप का कहना है कि ईरान की जनता पहले ही भारी आर्थिक दबाव झेल रही है और अगर उनकी आवाज़ को ताक़त के बल पर दबाया गया, तो यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होगा। उनके बयान को ईरान की सत्ता के लिए एक कड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
ईरान में हालात इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि आम नागरिकों का गुस्सा सिर्फ़ आर्थिक तंगी तक सीमित नहीं है। लोगों को लग रहा है कि सरकार उनकी समस्याओं को समझने और हल करने में नाकाम रही है। लंबे समय से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, कमजोर मुद्रा और बढ़ती कीमतों ने मध्यम और गरीब तबके की कमर तोड़ दी है। कई शहरों में हुए प्रदर्शनों में युवाओं और मज़दूरों की बड़ी भागीदारी यह दिखाती है कि असंतोष अब गहराता जा रहा है।
ट्रंप की चेतावनी से ईरान-अमेरिका संबंधों में एक बार फिर तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। भले ही ट्रंप इस समय सत्ता में नहीं हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनकी आवाज़ अब भी असर रखती है। उनके बयान को ईरान की सरकार अमेरिका की ओर से दबाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देख रही है। वहीं, ईरान का नेतृत्व इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल बताकर खारिज कर सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल ईरान की जनता का है। क्या उनकी आवाज़ सुनी जाएगी या हालात और सख़्त होंगे? आर्थिक संकट, सड़कों पर गुस्सा और अब अंतरराष्ट्रीय चेतावनियां—ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर फैसला आने वाले दिनों की दिशा तय करेगा। दुनिया की नज़र अब इस पर टिकी है कि तेहरान सत्ता संवाद का रास्ता चुनती है या टकराव का।




