अंतरराष्ट्रीय डेस्क 27 दिसंबर 2025
साल के आख़िरी दिनों में दुनिया की राजनीति एक बार फिर फ्लोरिडा की ओर देख रही है, जहाँ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की आमने-सामने बैठने वाले हैं। यह कोई सामान्य मुलाक़ात नहीं है। एक तरफ़ वह नेता हैं जो “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के साथ सत्ता में लौटने की तैयारी कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ वह राष्ट्रपति हैं जिनका देश पिछले कई वर्षों से युद्ध, तबाही और अनिश्चित भविष्य से जूझ रहा है। इसलिए यह बैठक सिर्फ़ हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने तक सीमित नहीं रहने वाली।
इस मुलाक़ात का सबसे बड़ा मुद्दा साफ़ है — रूस-यूक्रेन युद्ध। जेलेंस्की के लिए यह बैठक उम्मीद की एक खिड़की की तरह है। उनका देश थका हुआ है, लोग शांति चाहते हैं और पश्चिमी समर्थन की निरंतरता उनके लिए जीवनरेखा बन चुकी है। वहीं ट्रंप पहले भी कई बार कह चुके हैं कि अगर वे सत्ता में होते, तो यह युद्ध “इतना लंबा चलता ही नहीं।” अब जेलेंस्की यह जानना चाहते हैं कि ट्रंप की यह बात सिर्फ़ बयानबाज़ी थी या इसके पीछे कोई ठोस योजना भी है।
बैठक में यह भी चर्चा होगी कि अमेरिका यूक्रेन की सैन्य और आर्थिक मदद को किस रूप में देखता है। ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वे बिना शर्त मदद के पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में जेलेंस्की के सामने चुनौती है — कैसे वे अमेरिका को यह समझाएं कि यूक्रेन की मदद सिर्फ़ एक देश की नहीं, बल्कि पूरे यूरोप और वैश्विक स्थिरता की सुरक्षा है। यह बातचीत सिर्फ़ पैसों और हथियारों की नहीं, बल्कि भरोसे और भविष्य की साझेदारी की भी होगी।
इसके अलावा, युद्ध के बाद के यूक्रेन के पुनर्निर्माण, सुरक्षा गारंटी और नाटो से जुड़े सवाल भी मेज़ पर होंगे। जेलेंस्की चाहते हैं कि उनका देश फिर से खड़ा हो, लेकिन इस बार पहले से ज़्यादा सुरक्षित होकर। वहीं ट्रंप के लिए यह सवाल अहम है कि अमेरिका को इसमें कितनी भूमिका निभानी चाहिए और किस हद तक। यह टकराव सीधे-सीधे दो अलग राजनीतिक सोचों को सामने लाता है।
दिलचस्प बात यह है कि इस बैठक पर सिर्फ़ वॉशिंगटन और कीव ही नहीं, बल्कि मॉस्को, ब्रसेल्स और बीजिंग तक की निगाहें टिकी हैं। हर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि क्या फ्लोरिडा की यह बातचीत किसी नई शांति पहल की शुरुआत बनेगी या फिर यह सिर्फ़ कूटनीतिक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
कुल मिलाकर, ट्रंप और जेलेंस्की की यह मुलाक़ात सत्ता, युद्ध और इंसानी पीड़ा के बीच संतुलन तलाशने की कोशिश है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बातचीत से युद्ध की धुंध थोड़ी छंटेगी, या फिर दुनिया को अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा।




