राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 24 जून 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही घर में पैदा हुए सबसे बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के भीतर बागी खेमे और ममता बनर्जी समर्थक गुट के बीच खुली लड़ाई अब चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंच चुकी है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने दावा किया है कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” है। उनके अनुसार पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद उनके साथ हैं, इसलिए पार्टी के चुनाव चिह्न और संगठन पर उनका ही वैध अधिकार है।
बागी गुट ने चुनाव आयोग को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की नई सूची सौंपते हुए दावा किया कि पार्टी के 80 में से 65 विधायक और बड़ी संख्या में सांसद उनके साथ हैं। इस गुट ने हाल ही में एक बैठक कर ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया और हावड़ा सेंट्रल के विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित कर दिया।
बागी नेताओं का तर्क है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और पार्टी संविधान के अनुसार नई कार्यकारिणी का गठन आवश्यक था। उनका आरोप है कि पार्टी संगठन में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई।
दूसरी ओर ममता बनर्जी खेमे ने भी चुनाव आयोग को अपनी सूची भेज दी है, जिसमें ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव बनाए रखा गया है। दिलचस्प बात यह है कि ममता समर्थक गुट ने खुद को “मूल लेकिन अल्पमत वाला” पक्ष बताया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि विधायकों के स्तर पर पार्टी में गंभीर टूट हो चुकी है।
अब पूरा मामला चुनाव आयोग के पास है। आयोग चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा-15 और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सादिक अली बनाम चुनाव आयोग फैसले के आधार पर तय करेगा कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस कौन है। इसके लिए संगठनात्मक और विधायी दोनों स्तरों पर समर्थन का परीक्षण किया जाएगा।
यदि बागी गुट अपने दावों के अनुरूप बहुमत साबित कर देता है, तो ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है। वहीं यदि संगठनात्मक ढांचे में उनका नियंत्रण मजबूत साबित होता है, तो बागियों को नया दल बनाना पड़ सकता है।
करीब तीन दशक पहले कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। आज वही पार्टी अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी आंतरिक लड़ाई लड़ रही है। यह संघर्ष केवल नेतृत्व का नहीं, बल्कि पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और राजनीतिक विरासत पर नियंत्रण का है।
अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग पर टिकी हैं, क्योंकि उसका फैसला न केवल तृणमूल कांग्रेस का भविष्य तय करेगा बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा भी बदल सकता है।




