नई दिल्ली 24 अक्टूबर 2025
भारत में वायु प्रदूषण की भयावहता अब केवल पर्यावरण का संकट नहीं रही, यह एक जन स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, देश में गंभीर वायु प्रदूषण के चलते एक साल में अनुमानित 20 लाख लोगों की अकाल मृत्यु हुई है। यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि खराब हवा अब भारत में अकाल मौतों (Premature Deaths) का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन गई है। यह स्थिति न केवल दिल्ली और उत्तरी मैदानी इलाकों तक सीमित है, बल्कि देश के अधिकांश शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर बनी हुई है।
लाखों लोग रोज़ाना दूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, जिसका सीधा असर उनके फेफड़ों, हृदय और समग्र स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। यह विकट स्थिति स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर भारी बोझ डाल रही है और देश की श्रमशक्ति व आर्थिक उत्पादकता को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वायु प्रदूषण का समाधान केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और कल्याण का एक अनिवार्य हिस्सा है।
वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य पर गहराता संकट: फेफड़ों की बीमारी और हृदय घात का खतरा
रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण सीधे तौर पर गैर-संक्रामक बीमारियों (Non-Communicable Diseases – NCDs) की दर को बढ़ा रहा है, जिससे लाखों लोग समय से पहले अपनी जान गंवा रहे हैं। सूक्ष्म कण पदार्थ, विशेषकर PM2.5, जो ईंधन जलाने, वाहनों के उत्सर्जन और औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न होते हैं, सीधे फेफड़ों में और फिर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), फेफड़ों का कैंसर, हृदय घात (Heart Attack), और स्ट्रोक (Stroke) जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
वायु प्रदूषण के कारण होने वाली इन अकाल मौतों की संख्या सड़क दुर्घटनाओं या कुछ संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों की तुलना में कहीं अधिक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस स्थिति को एक “साइलेंट किलर” करार दिया है, क्योंकि वायु प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभाव धीरे-धीरे और चुपचाप मानव शरीर को खोखला करते जाते हैं, जिससे जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।
नीतिगत विफलता और समाधान की आवश्यकता: स्वास्थ्य और पर्यावरण को प्राथमिकता
भारत में वायु प्रदूषण का यह गंभीर स्तर लंबे समय से चली आ रही नीतिगत विफलता और पर्यावरण नियमों के कमजोर प्रवर्तन का परिणाम है। फसल अवशेष जलाने, कोयले पर आधारित ऊर्जा उत्पादन, अनियंत्रित शहरीकरण और वाहनों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में सरकारें अभी तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई हैं। रिपोर्ट में दी गई 20 लाख अकाल मौतों की संख्या सरकार और नीति निर्माताओं के लिए एक कठोर चेतावनी है कि अब इस समस्या को केवल मौसमी संकट मानकर टाला नहीं जा सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस भयावह स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ठोस और तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है, जिसमें इलेक्ट्रिक वाहनों को व्यापक रूप से अपनाना, अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना, सख्त औद्योगिक उत्सर्जन मानक लागू करना और प्रभावी जन जागरूकता अभियान चलाना शामिल है। जब तक पर्यावरण और जन स्वास्थ्य को सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बनाया जाता, तब तक भारत में अकाल मृत्यु का यह आंकड़ा खतरनाक रूप से बढ़ता रहेगा, जिससे देश के भविष्य पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।




