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कनाडा में भारतीय युवाओं पर मंडराता ख़तरा

कनाडा में भारतीय युवाओं पर मंडराता ख़तरा: दो हफ्तों में दो भारतीयों की हत्या, टोरंटो में सपने और ज़िंदगियाँ दोनों निशाने पर

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क 26 दिसंबर 2025

टोरंटो (कनाडा) — बेहतर भविष्य, सुरक्षित ज़िंदगी और उच्च शिक्षा के सपने लेकर कनाडा पहुंचे भारतीय युवाओं के लिए बीते दो हफ्ते डर, शोक और सवालों से भरे रहे। एक ओर यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के पास भारतीय मूल के छात्र शिवांक अवस्थी की गोली मारकर हत्या कर दी गई, तो दूसरी ओर हिमांशी खुराना की रहस्यमय हत्या ने पूरे भारतीय समुदाय को झकझोर कर रख दिया है। इन दो घटनाओं ने न सिर्फ टोरंटो, बल्कि पूरे कनाडा में रह रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के मन में गहरी असुरक्षा पैदा कर दी है।

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के स्कारबोरो कैंपस के पास दिनदहाड़े हुई गोलीबारी में शिवांक अवस्थी की जान चली गई। पुलिस के मुताबिक, गोली लगने के बाद शिवांक को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके। शिवांक भारत से कनाडा पढ़ाई के लिए गया था और अपने परिवार की उम्मीदों का सहारा था। उसके दोस्त बताते हैं कि वह बेहद मेहनती, मिलनसार और आगे बढ़ने का सपना देखने वाला आदमी था। उसकी मौत ने कैंपस के माहौल को सन्नाटे में बदल दिया है।

इससे पहले, भारतीय मूल की युवती हिमांशी खुराना की हत्या की खबर सामने आई थी। शुरुआती जानकारियों के अनुसार, यह मामला भी टोरंटो से जुड़ा है और परिस्थितियां अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाई हैं। दो हफ्तों में दो भारतीयों की मौत ने एक कड़वी सच्चाई को उजागर किया है—कि जिस कनाडा को लंबे समय से भारतीय छात्र “सेफ हेवन” मानते आए हैं, वहां अब डर धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।

इन घटनाओं के बाद कनाडा में रह रहे भारतीय छात्र सहमे हुए हैं। हॉस्टल, कैंपस और काम की जगहों पर एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या हम सच में सुरक्षित हैं? भारत में बैठे माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों को भरोसे और कर्ज़ के सहारे विदेश भेजा था, उनके लिए यह खबरें किसी डरावने सपने से कम नहीं हैं।

भारतीय दूतावास ने दोनों मामलों पर दुख जताते हुए कहा है कि वह पीड़ित परिवारों के संपर्क में है और हर संभव सहायता दी जा रही है। वहीं कनाडाई पुलिस ने जांच तेज़ करने और दोषियों को जल्द पकड़ने का भरोसा दिलाया है, लेकिन अब तक ठोस नतीजे सामने नहीं आए हैं।

शिवांक अवस्थी और हिमांशी खुराना की मौत सिर्फ दो नाम नहीं हैं, ये उन सैकड़ों-हजारों भारतीय युवाओं की चिंता का प्रतीक बन चुकी हैं, जो हर साल सपनों की गठरी लेकर विदेश जाते हैं। सवाल यही है—क्या सपनों की कीमत इतनी भारी हो गई है कि हर कुछ दिनों में एक आदमी की ज़िंदगी चुकानी पड़े? कनाडा की यह धरती अब सिर्फ अवसरों की नहीं, बल्कि जवाब मांगते सवालों की भी बनती जा रही है।

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