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नेपाल में बदलाव की आहट, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी: क्या सुधरेगी प्रांतों की हालत?

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ओपिनियन / अंतरराष्ट्रीय / नेपाल | समी अहमद | ABC NATIONAL NEWS | 29 अप्रैल 2026

नेपाल में नई सरकार बनने के बाद सुधार की बातें तेज़ हो गई हैं, लेकिन सवाल अभी भी वही है—क्या ये बदलाव जमीन पर दिखेंगे? प्रधानमंत्री के रूप में बलेन्द्र शाह के कार्यभार संभालने के एक महीने बाद सरकार ने 100 बिंदुओं वाला एक बड़ा सुधार एजेंडा जारी किया है। इसमें मंत्रालयों की संख्या घटाकर 17 करने, बेकार बोर्ड और समितियों को खत्म करने और सरकारी कामकाज को पारदर्शी बनाने जैसे कदम शामिल हैं। शुरुआत देखने में मजबूत लगती है, लेकिन असली चुनौती इन फैसलों को लागू करने की है। सरकार ने प्रांतों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठकर उनकी समस्याएं सुनी हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश हो रही है। मुख्यमंत्रियों ने भी इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। हालांकि, अभी तक इसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। यानी बातचीत अच्छी है, लेकिन काम का असर दिखना बाकी है।

नेपाल में संघीय व्यवस्था (फेडरल सिस्टम) लागू हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन अब भी काम के बंटवारे को लेकर भ्रम बना हुआ है। केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारें कई बार एक ही तरह के काम करती नजर आती हैं, जिससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जिम्मेदारियों को साफ-साफ बांटा जाए, तो काम ज्यादा तेजी और प्रभावी तरीके से हो सकता है।

एक बड़ी समस्या प्रशासनिक ढांचे की भी है। प्रांत और स्थानीय सरकारें अभी भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं, क्योंकि अधिकारियों की नियुक्ति और नियंत्रण केंद्र के हाथ में है। इससे नीचे के स्तर पर काम करने में दिक्कत आती है और फैसले लेने में देरी होती है। सरकार ने 45 दिनों में नया सिविल सेवा कानून लाने की बात कही है, जो अगर सही तरीके से लागू हुआ, तो हालात बेहतर हो सकते हैं।

सिर्फ व्यवस्था ही नहीं, पैसों का मामला भी बड़ा मुद्दा है। पिछले कुछ सालों में कई जिम्मेदारियां राज्यों और स्थानीय निकायों को दे दी गई हैं, लेकिन उनके पास उतने संसाधन नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि जहां इन संस्थाओं पर खर्च का बोझ बढ़ा है, वहीं उनकी आमदनी बहुत कम है। इस वजह से विकास के काम प्रभावित हो रहे हैं और लोगों को लगता है कि व्यवस्था काम नहीं कर रही।

इसके अलावा, अलग-अलग सरकारी संस्थाओं के बीच तालमेल की कमी भी एक बड़ी परेशानी है। कई अहम परिषद और समितियां सालों से सक्रिय नहीं हैं, जिससे नीतियों को सही दिशा नहीं मिल पा रही। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इन संस्थाओं को फिर से सक्रिय किया जाए, तो कई समस्याओं का समाधान निकल सकता है।

नेपाल की नई सरकार ने जो संकेत दिए हैं, वे उम्मीद जरूर जगाते हैं। लेकिन असली बदलाव तभी आएगा, जब ये योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर उतरेंगी। जनता अब सिर्फ घोषणाएं नहीं, बल्कि परिणाम देखना चाहती है। नेपाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां दिशा सही दिख रही है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। आने वाले कुछ महीने तय करेंगे कि यह बदलाव सिर्फ वादों तक सीमित रहेगा या सच में लोगों की जिंदगी में फर्क लाएगा।

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