नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों पर ऐसी टिप्पणी की है जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने बीजेपी के अप्रत्याशित—और कुछ के लिए संदिग्ध—स्ट्राइक रेट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “चोरों की उपलब्धियों की कितनी चर्चा करें?” उनका बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारतीय चुनावी प्रक्रिया में हो रहे बड़े बदलावों की ओर इशारा करता है—ऐसे बदलाव जिन्हें देखकर अब हैरानी नहीं होती, बल्कि चिंता होती है।
बघेल ने महाराष्ट्र और बिहार दोनों राज्यों में बीजेपी की चुनावी सफलता के पीछे के गणित पर सीधा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में बीजेपी ने सहयोगी दलों के साथ चुनाव लड़ते हुए 149 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और 132 सीटें जीत लीं, जो 88.5% का चौंकाने वाला स्ट्राइक रेट है। भारतीय चुनावी इतिहास में ऐसी सफलता सिर्फ कथाओं में सुनाई देती है—या फिर तब, जब मैदान पूरी तरह एकतरफा बना दिया जाए। लेकिन यह असंभव जीत यहीं खत्म नहीं हुई। बिहार में बीजेपी ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा और 89 सीटें जीत लीं, लगभग वही स्ट्राइक रेट—88.11%। दो अलग-अलग राज्यों में, दो अलग-अलग परिस्थितियों में, सहयोगी दलों के साथ चुनाव लड़ते हुए लगभग एक जैसी—और असाधारण—सफलता। राजनीति में संयोग होते हैं, लेकिन इतने बड़े और इतने समान संयोग अक्सर नहीं होते।
बघेल कहते हैं कि यह दर “भारतीय चुनाव प्रक्रिया में असंभव” है। लेकिन वे यह भी जोड़ते हैं कि यह उन्हें “चकित नहीं करती”—और इसका कारण साफ है। उनके मुताबिक आज राहुल गांधी ने देश के सामने वोट चोरी के प्रमाण रख दिए हैं। उन्होंने मतदाता सूची में हेरफेर, बूथों पर गड़बड़ी, अवैध वोटिंग, वोटर डिलीशन और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग जैसे मामलों को उजागर किया है। बघेल का तर्क है कि जब चोरी का खेल सार्वजनिक हो चुका है, तब ऐसे चमत्कारिक स्ट्राइक रेट हैरान नहीं करते—बल्कि इस बात की पुष्टि करते हैं कि चुनाव अब जनमत का नहीं, प्रबंधित परिणामों का खेल बनता जा रहा है।
उन्होंने कहा, “वोट चोरी करके हासिल हुई इस उपलब्धि की कैसे तारीफ़ करें और क्यों करें?”
यह सवाल महज बीजेपी पर प्रहार नहीं, बल्कि पूरे चुनावी तंत्र पर गंभीर सवाल है। बघेल ने सीधे कहा कि जिन्हें शर्मिंदा होना चाहिए, वे उल्टा अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं—“शायद यही चोरों की विशेषता होती है।” यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से तीखी है, पर इस टिप्पणी में छुपा संदेश बहुत स्पष्ट है—अगर चुनावों में ईमानदारी नहीं बची तो लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल जाएगा।
बघेल का यह बयान विपक्ष की ओर से अब तक की सबसे साफ और आक्रामक टिप्पणी मानी जा रही है, क्योंकि इसमें सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि एक बड़ा दावा है—कि जनता के सामने सबूत रखे जा चुके हैं। और अगर सबूत हैं, तो चुनावी परिणामों को ‘जनादेश’ कहना जनता की बुद्धि का अपमान है।
यह बयान उस राजनीतिक माहौल में आया है जहाँ पूरे देश में सवाल उठ रहे हैं—क्या चुनाव अब जनता की पसंद का प्रतिबिंब हैं या एक संगठित तंत्र की व्यवस्था? क्या स्ट्राइक रेट ‘ग्राउंड वर्क’ से आता है या ‘डेटा वर्क’ से? और सबसे बड़ा सवाल—क्या भारत में चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन ज़रूरी है या सिर्फ सिस्टम का सहयोग काफी है?
भूपेश बघेल ने इन सवालों को सिर्फ उठाया ही नहीं, बल्कि इन्हें बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। और जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक ऐसी ‘चमत्कारिक जीतों’ की चमक पर शक की धूल जमती रहेगी।




