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आतंकवाद का असली चेहरा: धर्म नहीं, नफरत की इंडस्ट्री—जहां हर पीड़ित सिर्फ इंसान

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एबीसी डेस्क 15 दिसंबर 2025

आतंकवाद की बहस में सबसे बड़ा धोखा यही है कि उसे बार-बार किसी एक धर्म से जोड़ दिया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि आतंकवाद मानवता के खिलाफ अपराध है, किसी आस्था की उपज नहीं। धर्म अक्सर इस क्रूरता का मुखौटा बना दिया जाता है—नफरत को वैध ठहराने का औजार—जबकि कोई भी धार्मिक ग्रंथ निर्दोषों की हत्या को इबादत नहीं मानता। 15 मार्च 2019 को न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में अल नूर और लिंकन रोड मस्जिदों पर हुआ नरसंहार इसी सच्चाई का भयावह उदाहरण है, जहां ब्रेंटन टैरेंट नामक एक श्वेत श्रेष्ठतावादी ने 51 नमाजियों की हत्या कर दी और अपनी क्रूरता को लाइव स्ट्रीम कर दुनिया को दहला दिया। उसके विचार ‘क्रूसेड’ जैसे शब्दों में लिपटे थे, लेकिन इस हमले को ‘ईसाई आतंकवाद’ कहने से बचते हुए ‘दक्षिणपंथी चरमपंथ’ या ‘श्वेत श्रेष्ठतावाद’ कहा गया—यहीं से दोहरे मानदंड उजागर होते हैं।

यह दोहरापन भारत के संदर्भ में और तीखा दिखाई देता है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में पर्यटकों से धर्म पूछकर 26 निर्दोष लोगों की हत्या की गई। जांच एजेंसियों ने इसे पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकी नेटवर्क से जोड़ा और वैश्विक मीडिया ने इसे तुरंत ‘इस्लामिक आतंकवाद’ का लेबल दिया। सवाल यह नहीं कि हमले की निंदा हो—वह तो निर्विवाद है—सवाल यह है कि लेबलिंग किस आधार पर बदल जाती है। क्राइस्टचर्च में धर्म को किनारे रख दिया जाता है, पहलगाम में धर्म को शीर्षक बना दिया जाता है। क्या यह चयनात्मक नैरेटिव आतंकवाद की जड़ों को समझने में मदद करता है, या नफरत को और गाढ़ा करता है?

14 दिसंबर 2025 को सिडनी के बॉन्डी बीच पर हनुक्का के दौरान यहूदियों को निशाना बनाकर की गई गोलीबारी ने एक बार फिर दिखाया कि धार्मिक पहचान को हथियार बनाना कितना आसान हो गया है। इस एंटी-सेमिटिक हमले की वैश्विक निंदा हुई, लेकिन मीडिया विमर्श में फिर वही सवाल उभरा—किसे कौन-सा लेबल दिया जाए। असलियत यह है कि इन तीनों घटनाओं में एक समान सूत्र है: कट्टर वैचारिक प्रोपेगैंडा, हथियारों तक आसान पहुंच और ऑनलाइन नफरत का पारिस्थितिकी तंत्र। धर्म नहीं, बल्कि यह ‘इंडस्ट्री’ हत्याओं को जन्म देती है।

वैश्विक आतंकवाद सूचकांक 2025 की तस्वीर भी इसी ओर इशारा करती है। आतंकवाद से सबसे अधिक मौतें मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में दर्ज हैं—साहेल से लेकर दक्षिण एशिया तक—जहां पीड़ितों का बहुमत स्वयं मुसलमान है। यह तथ्य उस मिथक को तोड़ता है कि आतंकवाद किसी एक समुदाय का पर्याय है। इसके बावजूद सार्वजनिक विमर्श में ‘इस्लामिक’ जैसे विशेषण सहजता से चिपका दिए जाते हैं, जबकि अन्य संदर्भों में भाषा बदल जाती है। यह भाषा-राजनीति आतंकवाद से लड़ने के बजाय उसे ईंधन देती है।

भारत में नफरत की राजनीति का असर लिंचिंग और जाति-आधारित हिंसा के मामलों में भी दिखता है—जहां पीड़ित की पहचान खबर की अहमियत तय कर देती है। कहीं नाम और धर्म उछाला जाता है, कहीं चुप्पी साध ली जाती है। यह चयनात्मक संवेदना लोकतंत्र और न्याय—दोनों को कमजोर करती है। जब हम हिंसा को ‘उनका’ और पीड़ा को ‘हमारा’ बना देते हैं, तब आतंकवाद अपना सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल कर लेता है: समाज का ध्रुवीकरण।

आतंकवाद से लड़ाई धर्म-विरोधी नहीं, इंसानियत-समर्थक होनी चाहिए। इसे ‘ईसाई’, ‘इस्लामिक’ या किसी भी धार्मिक विशेषण से अलग रखकर केवल आतंकवाद कहा जाना चाहिए। जड़ों पर प्रहार जरूरी है—हथियारों के अवैध कारोबार, कट्टर ऑनलाइन नेटवर्क, और नफरत फैलाने वाली राजनीति पर। कुरान से लेकर हर धर्मग्रंथ निर्दोष की हत्या को अपराध बताता है; इसलिए धर्म को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि मानव जीवन को केंद्र में रखना ही सच्ची लड़ाई है। जब हम यह समझेंगे कि हर पीड़ित पहले इंसान है, तभी ब्रेंटन, पहलगाम के हत्यारे और बॉन्डी बीच के गनमैन—सबकी दुनिया में जगह खत्म होगी।

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