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समाजवादियों की बैसाखी से सांसद बने जयंत चौधरी की कहानी : खुद की पार्टी में एक भी महिला नहीं, दूसरे को कोस रहे हैं

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राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 अप्रैल 2026

भारतीय राजनीति में बयान बदलना अब असामान्य नहीं रहा, लेकिन जब बयान और व्यवहार के बीच का अंतर बहुत स्पष्ट दिखने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के नेता Jayant Chaudhary इस समय ठीक इसी स्थिति में नजर आते हैं।

आज वे इंडिया गठबंधन पर हमलावर हैं, खासकर Akhilesh Yadav की समाजवादी पार्टी पर। लेकिन राजनीतिक स्मृति इतनी कमजोर भी नहीं होती कि लोग भूल जाएं—यही जयंत चौधरी समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे थे। सवाल यह नहीं है कि कोई नेता अपना राजनीतिक रुख क्यों बदलता है; सवाल यह है कि क्या वह बदलाव सिद्धांतों पर आधारित है या सिर्फ अवसर पर।

इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू और भी गंभीर है—महिला प्रतिनिधित्व। जिस समय जयंत चौधरी दूसरे दलों को घेर रहे हैं, उसी समय उनकी अपनी पार्टी के आंकड़े असहज करने वाले हैं। आरएलडी में महिला लोकसभा सांसद शून्य, राज्यसभा में शून्य, विधानसभा और विधान परिषद में भी महिला प्रतिनिधित्व नगण्य। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाज़िमी है कि क्या महिला सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों तक सीमित है?

राजनीति में नैतिक अधिकार (moral authority) बहुत मायने रखता है। जब कोई नेता किसी मुद्दे पर दूसरे को कठघरे में खड़ा करता है, तो उससे पहले यह अपेक्षा होती है कि वह अपने घर को दुरुस्त रखे। जयंत चौधरी के मामले में यही कमी सबसे ज्यादा उजागर हो रही है।

उनका पुराना बयान—“चवन्नी थोड़ी हूँ कि पलट जाऊँगा”—आज फिर चर्चा में है। यह सिर्फ एक जुमला नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक वादा जैसा था। लेकिन कुछ ही सालों में इंडिया गठबंधन से अलग होकर एनडीए में शामिल होना उस बयान के ठीक उलट कदम माना जा रहा है। राजनीति में गठबंधन बदलना गलत नहीं है, परंतु सार्वजनिक रूप से दिए गए दावों के विपरीत कदम उठाने से विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।

दरअसल, यह पूरा मामला किसी एक नेता या पार्टी तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें विचारधारा पीछे छूटती जा रही है और तात्कालिक राजनीतिक लाभ आगे आ जाता है। गठबंधन बनते और टूटते हैं, बयान बदलते हैं, और अंततः जनता के सामने सवाल यही रह जाता है—क्या राजनीति में स्थिरता और सिद्धांत अब भी कोई मायने रखते हैं?

जयंत चौधरी के ताजा हमले और उनके पुराने राजनीतिक सफर के बीच का विरोधाभास इसी बड़े सवाल को सामने लाता है। अगर वे वास्तव में महिला सशक्तिकरण या राजनीतिक शुचिता की बात करना चाहते हैं, तो शुरुआत अपने संगठन से करनी होगी। वरना यह आलोचना केवल राजनीतिक बयानबाज़ी बनकर रह जाएगी—जिसमें शब्द तो बहुत होंगे, लेकिन विश्वसनीयता कम।

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