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नेहरू को छोटा करने की राजनीति और इतिहास से छेड़छाड़ का संकट

ओपिनियन | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 जून 2026

भारतीय राजनीति में इन दिनों इतिहास को नए चश्मे से देखने और दिखाने की होड़ लगी हुई है। इस क्रम में सबसे अधिक निशाने पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं। हाल के दिनों में यह दावा किया जा रहा है कि वर्तमान प्रधानमंत्री देश के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले “निर्वाचित” प्रधानमंत्री बन गए हैं। इस दावे को स्थापित करने के लिए नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को “नॉन-इलेक्टेड” या “गैर-निर्वाचित” बताने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह केवल एक राजनीतिक तर्क नहीं, बल्कि इतिहास की बुनियादी समझ को चुनौती देने वाला दावा है।

यह याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता के बाद बनी अंतरिम सरकार और उसके बाद का शासन किसी व्यक्ति की नियुक्ति से नहीं, बल्कि संविधान सभा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से संचालित था। संविधान सभा केवल संविधान बनाने वाली संस्था नहीं थी, बल्कि वही उस दौर की सर्वोच्च विधायी और राजनीतिक शक्ति भी थी। ऐसे में उस सरकार को गैर-निर्वाचित बताना इतिहास की वास्तविकता को नकारने जैसा है।

यदि 1947 से 1952 के बीच की सरकार को गैर-निर्वाचित कहा जाता है, तो इसका असर केवल पंडित नेहरू तक सीमित नहीं रहता। इसका अर्थ यह भी होगा कि लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल एक कथित गैर-निर्वाचित सरकार में उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे। इसका अर्थ यह भी होगा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर, जिन्होंने उसी सरकार में कानून मंत्री के रूप में संविधान निर्माण और आधुनिक भारत की कानूनी नींव रखी, वे भी किसी गैर-वैध व्यवस्था का हिस्सा थे। क्या वास्तव में ऐसा कहा जा सकता है?

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इतिहास की इस व्याख्या से देश की पहली महिला केंद्रीय मंत्री राजकुमारी अमृत कौर की भूमिका भी कमतर हो जाती है। बाबू जगजीवन राम जैसे महान दलित नेता के शुरुआती मंत्रित्व काल पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। विडंबना यह है कि इस तर्क की जद में जनसंघ के संस्थापक और दक्षिणपंथी राजनीति के प्रमुख वैचारिक स्तंभ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी आ जाते हैं, जो उसी मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। इसलिए यह केवल नेहरू की विरासत का प्रश्न नहीं है, बल्कि स्वतंत्र भारत के राष्ट्र-निर्माण काल की सामूहिक उपलब्धियों का प्रश्न है।

दरअसल, समस्या इतिहास से नहीं, बल्कि तुलना की राजनीति से पैदा होती है। जब किसी समकालीन नेता को हर कीमत पर “प्रथम” सिद्ध करने की कोशिश होती है, तब अतीत के नेताओं को छोटा दिखाने का प्रयास शुरू हो जाता है। लेकिन इतिहास की महानता किसी दूसरे की उपलब्धियों को कम करके नहीं बढ़ाई जा सकती। किसी नेता की सफलता उसके अपने कार्यों, दृष्टि और योगदान से तय होती है, न कि पूर्ववर्तियों के कद को घटाने से।

जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वे कितने वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे। उनकी वास्तविक पहचान उस आधुनिक भारत से जुड़ी है जिसकी नींव उन्होंने रखी। सीमित संसाधनों, विभाजन की त्रासदी, शरणार्थी संकट, कमजोर अर्थव्यवस्था और अनेक चुनौतियों के बीच उन्होंने लोकतंत्र, वैज्ञानिक सोच, सार्वजनिक संस्थानों और विकास की दीर्घकालिक संरचना को आकार दिया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान, बड़े बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग, अंतरिक्ष कार्यक्रम और स्वतंत्र विदेश नीति जैसे अनेक स्तंभ उसी दौर में खड़े हुए।

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दुनिया के हर देश में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनका महत्व केवल उनके पद या कार्यकाल से नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका से तय होता है। अमेरिका में जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन और फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट का स्थान इसी कारण विशेष है। भारत में जवाहरलाल नेहरू का स्थान भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनसे असहमति हो सकती है, उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, लेकिन उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारना या कमतर करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

लोकतंत्र में आलोचना स्वस्थ परंपरा है, लेकिन इतिहास का पुनर्लेखन केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाए तो यह आने वाली पीढ़ियों को भ्रमित करता है। किसी नेता की महानता साबित करने के लिए राष्ट्र निर्माण की पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना न तो तर्कसंगत है और न ही राष्ट्रहित में।

इतिहास अंततः तथ्यों के आधार पर अपना फैसला देता है। राजनीतिक नारे, प्रचार अभियान और क्षणिक लोकप्रियता समय के साथ बदल जाती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण में किए गए कार्य स्थायी रहते हैं। यही कारण है कि जवाहरलाल नेहरू का नाम भारतीय इतिहास में उन व्यक्तित्वों की श्रेणी में दर्ज है, जिन्होंने आधुनिक भारत की बुनियाद रखी। उस विरासत को राजनीतिक सुविधा के अनुसार छोटा नहीं किया जा सकता।

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