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अवसरवाद की राजनीति या विचारधारा का संकट? सुष्मिता देव का सफर कई सवाल छोड़ गया

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 जून 2026

भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है। आजादी के बाद से लेकर अब तक हजारों नेता अलग-अलग कारणों से राजनीतिक दल बदलते रहे हैं। लेकिन कुछ राजनीतिक यात्राएं ऐसी होती हैं जो केवल एक नेता के फैसले की कहानी नहीं होतीं, बल्कि वे भारतीय राजनीति में विचारधारा, प्रतिबद्धता और अवसरवाद के बदलते स्वरूप पर भी बड़े सवाल खड़े करती हैं। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद रहीं सुष्मिता देव का हालिया इस्तीफा भी ऐसी ही एक राजनीतिक घटना बनकर उभरा है।

सुष्मिता देव का राजनीतिक जीवन कांग्रेस की देन माना जाता है। कांग्रेस ने उन्हें न केवल राजनीतिक पहचान दी, बल्कि संगठन और संसद तक पहुंचने का अवसर भी दिया। वर्ष 2011 में कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा चुनाव लड़वाया और वह विधायक बनीं। इसके बाद 2014 में कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा का टिकट दिया और वह सांसद बनकर संसद पहुंचीं। युवा और मुखर महिला नेता के रूप में उनकी पहचान बनी तो पार्टी ने 2017 में उन्हें अखिल भारतीय महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी नियुक्त किया। यह वह दौर था जब कांग्रेस उन्हें भविष्य के बड़े नेतृत्व के रूप में देख रही थी।

हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद अगस्त 2021 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। उस समय इसे कांग्रेस नेतृत्व से असंतोष और पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा गया। दिलचस्प बात यह रही कि कांग्रेस छोड़ने के कुछ ही सप्ताह बाद तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। वर्ष 2024 में पार्टी ने उन पर दोबारा भरोसा जताते हुए फिर से राज्यसभा का सदस्य बनाया। यह दर्शाता है कि तृणमूल कांग्रेस ने भी उन्हें संगठन और संसद दोनों में महत्वपूर्ण स्थान दिया।

लेकिन मई 2026 में पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इसके ठीक बाद जून 2026 में सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। अब उनकी नई राजनीतिक दिशा को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि वह जल्द ही किसी नए राजनीतिक मंच पर दिखाई दे सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां राजनीति से बड़ा सवाल विचारधारा पर खड़ा होता है।

किसी भी लोकतंत्र में हर नेता को अपनी राजनीतिक राह चुनने का अधिकार है। संविधान भी यही अधिकार देता है। लेकिन जब कोई नेता लगातार अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों के बीच यात्रा करता है, तब स्वाभाविक रूप से जनता यह पूछती है कि आखिर उसकी मूल वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है? क्या विचारधारा वास्तव में इतनी लचीली हो गई है कि परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहे? या फिर आधुनिक राजनीति में विचारधारा की जगह केवल राजनीतिक संभावनाओं और व्यक्तिगत भविष्य ने ले ली है?

यह सवाल केवल सुष्मिता देव तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में लगभग सभी दलों ने ऐसे नेताओं को देखा है जो चुनावी परिस्थितियों और सत्ता के समीकरणों के अनुसार अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलते रहे हैं। यही कारण है कि आज आम मतदाता के मन में यह धारणा मजबूत हो रही है कि राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक दूरी लगातार कम होती जा रही है, जबकि व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अधिक प्रभावशाली होती जा रही हैं।

दूसरी ओर राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी बनती है। यदि कोई पार्टी किसी नेता को विधायक, सांसद, राष्ट्रीय पदाधिकारी और राज्यसभा सदस्य जैसे महत्वपूर्ण अवसर देती है, लेकिन वह नेता अवसर मिलते ही दूसरी राह चुन लेता है, तो यह पार्टी की नेतृत्व क्षमता और आंतरिक संवाद पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आखिर ऐसा क्या होता है कि जिन नेताओं पर वर्षों तक भरोसा किया जाता है, वही नेता सबसे पहले राजनीतिक जहाज छोड़ने लगते हैं?

सुष्मिता देव का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका पूरा राजनीतिक सफर विभिन्न दलों द्वारा दिए गए अवसरों से भरा रहा है। कांग्रेस ने उन्हें राजनीतिक पहचान दी, तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा और राष्ट्रीय मंच दिया। अब यदि वह फिर किसी नए राजनीतिक पड़ाव की ओर बढ़ती हैं, तो यह बहस और तेज होगी कि भारतीय राजनीति में विचारधारा का स्थान कितना बचा है।

आखिरकार फैसला जनता को करना है। यह कहानी किसी एक नेता की नहीं, बल्कि उस राजनीति की है जहां विचारधारा और अवसरवाद के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। सवाल आज भी वही है—क्या यह पार्टियों की विफलता है, या नेताओं की बदलती प्राथमिकताओं का परिणाम? शायद इसका जवाब आने वाले समय में भारतीय राजनीति खुद देगी।

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