पटना 24 अक्टूबर 2025
बिहार चुनाव की औपचारिक शुरुआत से पहले ही राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने एक विस्फोटक और गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि राज्य में लोकतंत्र की हत्या का खेल शुरू हो चुका है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने खुले तौर पर कहा है कि यह सब कुछ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सीधे इशारे पर हो रहा है, जिसके तहत चुनाव आयोग की मशीनरी और स्थानीय प्रशासन ने परिणाम घोषित होने से पहले ही विपक्षी उम्मीदवारों को चुनावी मैदान से बाहर करने की साज़िश रचनी शुरू कर दी है। यह आरोप कैमूर जिले की मोहनिया विधानसभा सीट से आरजेडी प्रत्याशी श्वेता सुमन के नामांकन को अचानक रद्द किए जाने के संदर्भ में लगाया गया है। आरजेडी ने इस कार्रवाई को ‘राजनीतिक दबाव’ और ‘अनुचित साजिश’ का सीधा परिणाम बताया है, जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं पर सीधा और अस्वीकार्य हमला है। पार्टी का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयाँ यह दर्शाती हैं कि सत्ताधारी दल अब निष्पक्ष चुनाव लड़ने के बजाय प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करके परिणामों को पूर्वनिर्धारित करने की दिशा में काम कर रहा है।
वैध दस्तावेजों के बावजूद नामांकन रद्द: पूर्वनियोजित राजनीतिक चाल का प्रमाण
आरजेडी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मोहनिया सीट से पार्टी प्रत्याशी श्वेता सुमन इस क्षेत्र की स्थायी निवासी हैं और उन्होंने 20 अक्टूबर 2025 को अपना नामांकन दाखिल करते समय सभी आवश्यक और वैध दस्तावेज़—जिनमें जाति प्रमाण पत्र भी शामिल है—विधि अनुसार प्रस्तुत किए थे। इन सभी दस्तावेजों को संबंधित सरकारी अधिकारियों द्वारा विधिवत प्रमाणित किया गया था। सबसे पहले, रिटर्निंग ऑफिसर ने उसी दिन यानी 20 अक्टूबर को उनके नामांकन को स्वीकार भी कर लिया था। इसके बावजूद, बीजेपी से जुड़े दो उम्मीदवारों ने उनके जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर आपत्ति दर्ज कराई। आरजेडी का आरोप है कि महज़ दो दिनों के भीतर, 22 अक्टूबर को, रिटर्निंग ऑफिसर ने बिना किसी उचित सुनवाई, बिना पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक दबाव के तहत उनका नामांकन रद्द कर दिया। आरजेडी ने इस जल्दबाजी और एकतरफा कार्रवाई को “पूर्वनियोजित राजनीतिक चाल” बताया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मोहनिया विधानसभा सीट पर विपक्षी उम्मीदवार को अनुचित तरीके से चुनाव से बाहर करना और भाजपा के लिए मैदान साफ़ करना था।
Circle Officer की रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की खुली अवमानना
नामांकन रद्द करने के निर्णय के पीछे का आधार Circle Officer (सीओ), दुर्गावती की एक रिपोर्ट थी, जिसमें श्वेता सुमन के जाति प्रमाण पत्र को नियमों के अनुरूप नहीं बताते हुए निरस्त कर दिया गया। आरजेडी ने इस रिपोर्ट को कानूनी दृष्टि से अवैध और भ्रामक करार दिया है क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट द्वारा जाति प्रमाण पत्र के सत्यापन और निरस्तीकरण के लिए निर्धारित जांच प्रक्रिया का घोर उल्लंघन किया गया है। पार्टी ने ‘बैजनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य’ मामले का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है, जिसमें यह स्थापित किया गया था कि किसी भी जाति प्रमाण पत्र को रद्द करने या उसकी अंतिम रूप से जाँच करने का अधिकार केवल Scrutiny Committee (जांच समिति) के पास होता है, न कि किसी Circle Officer या Retuming Officer के पास।
इन स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देशों के बावजूद, चुनाव अधिकारी ने बिना किसी समिति के गठन, बिना विधिवत जांच और बिना सुनवाई के केवल सीओ की रिपोर्ट को आधार बनाकर नामांकन खारिज कर दिया। आरजेडी का कहना है कि यह न सिर्फ़ कानूनी उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़—निष्पक्ष प्रक्रिया—को तोड़ने और सत्ताधारी दल को लाभ पहुँचाने की एक सोची-समझी कोशिश है।
Returning Officer की भूमिका पर सवाल: “भाजपा के दबाव में लिखा झूठा फैसला”
आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि उन पर भाजपा के स्थानीय नेताओं द्वारा भारी दबाव डाला गया और उन्हें एक पूर्वनिर्धारित निर्णय मानने के लिए मजबूर किया गया। प्रेस विज्ञप्ति में यह विस्फोटक दावा किया गया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सुनवाई के नाम पर केवल एक औपचारिकता निभाई, जबकि उनका अंतिम निर्णय पहले से ही “लिखा हुआ” था। आरजेडी प्रत्याशी श्रीमती श्वेता सुमन को जब बुलाया गया और उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की, तो चुनाव अधिकारी ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आदेश पहले ही पारित हो चुका है।
आरजेडी का सीधा आरोप है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने “भाजपा द्वारा तैयार किए गए मसौदे पर केवल हस्ताक्षर किए” और यह आदेश पहले से तैयार फाइल में रखा गया था। यह खुलासा बताता है कि बिहार में प्रशासनिक अधिकारी अब ‘डबल इंजन सरकार’ के राजनीतिक आदेशों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया और निष्पक्षता से ऊपर रख रहे हैं, जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक गारंटी के लिए एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम करता है।
चुनाव आयोग पर तीखा बयान: “डर और दबाव में काम कर रही मशीनरी”
आरजेडी ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में यह तीखा बयान दिया है कि बिहार में चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संस्था नहीं रहा और वह “डर और दबाव में काम कर रहा है”, जिससे उसकी निष्पक्ष भूमिका संदिग्ध हो गई है। पार्टी ने इस बात पर जोर दिया है कि चुनाव आयोग का प्राथमिक दायित्व लोकतंत्र की रक्षा करना और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, न कि सत्ताधारी दल के राजनीतिक इशारों पर काम करना।
आरजेडी के अनुसार, भाजपा और उसके सहयोगी दल प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं को एक ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर विपक्ष को कुचलने की कोशिश में लगे हुए हैं, और मोहनिया का मामला इसका सीधा प्रमाण है जहाँ रिटर्निंग ऑफिसर और सर्किल ऑफिसर दोनों ने भाजपा नेताओं के आदेश पर कार्य किया है। आरजेडी ने इसे केवल एक सीट का मामला नहीं, बल्कि “भाजपा द्वारा चुनावी प्रक्रिया का अपहरण करने की शुरुआत” बताया है। सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि यह घटना केवल एक प्रत्याशी के साथ अन्याय नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है, जहाँ “निष्पक्ष प्रतियोगिता” को खत्म कर “भाजपा द्वारा तय उम्मीदवारों की फिक्सिंग” की जा रही है, जो लोकतंत्र नहीं, बल्कि तानाशाही का ट्रेलर है।
आरजेडी की मांग और निष्कर्ष: “भाजपा अब चुनाव नहीं, परिणाम नियंत्रित कर रही है”
इस गंभीर घटना के आलोक में, आरजेडी ने चुनाव आयोग से तत्काल और कठोर कार्रवाई की मांग की है। उनकी मांगों में मोहनिया विधानसभा सीट से श्रीमती श्वेता सुमन के नामांकन को अविलंब बहाल करना, दोषी रिटर्निंग ऑफिसर और सर्किल ऑफिसर के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई करना, और इस पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र Scrutiny Committee या न्यायिक आयोग से कराना शामिल है। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे इस मामले को पटना हाईकोर्ट में उठाएंगे और चुनाव आयोग की भूमिका की संवैधानिक समीक्षा की मांग करेंगे।
आरजेडी का निष्कर्ष स्पष्ट और विस्फोटक है: यह घटना बिहार की राजनीति में एक गंभीर संकेत है कि “भाजपा अब चुनाव नहीं, बल्कि परिणाम नियंत्रित करने की दिशा में काम कर रही है।” ‘अमित शाह के इशारे पर सीटें चुराने’ का यह आरोप महज राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस भयावह दौर की झलक है जहाँ लोकतंत्र को प्रशासनिक प्रोटोकॉल और कागज़ी पन्नों में सीमित कर दिया गया है। आरजेडी ने चेतावनी दी है कि यह लड़ाई सिर्फ एक प्रत्याशी के लिए नहीं, बल्कि “भारत के लोकतंत्र की है,” और अगर आज मोहनिया में न्याय नहीं मिला, तो कल पूरे देश में चुनाव केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।




