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मोदी–ट्रंप ‘कोर्टशिप’ का कड़वा सच

मोदी–ट्रंप ‘कोर्टशिप’ का कड़वा सच : अमेरिकी लॉबिस्ट पर करोड़ों लुटे, भारत को मिला शून्य

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एबीसी न्यूज 8 जनवरी 2026

चमकदार दोस्ती के पीछे की स्याह परत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच जिस “विशेष रिश्ते” को मंचों, झंडों और सोशल मीडिया पोस्टों में महिमामंडित किया गया, उसकी असलियत अब दस्तावेज़ों के आईने में बेनकाब है। द वायर की रिपोर्ट और अमेरिकी सरकारी फाइलिंग्स साफ़ बताती हैं कि भारत ने ट्रंप के पूर्व चुनावी अभियान से जुड़े एक प्रभावशाली लॉबिस्ट के सहारे वॉशिंगटन में रास्ता बनाने की कोशिश की—लेकिन नतीजा? न व्यापार में राहत, न टैरिफ में ढील, न रणनीतिक बढ़त। यह दोस्ती नहीं, महंगी नाकामी की पटकथा है।

लॉबिस्ट की तैनाती: सत्ता से सटकर, जनता से दूर

भारत-अमेरिका संबंधों को “आगे बढ़ाने” के नाम पर SHW Partners LLC को मैदान में उतारा गया, जिसके मुखिया जेसन मिलर—ट्रंप के करीबी और चुनावी मशीनरी के अहम चेहरा—रहे हैं। FARA दस्तावेज़ बताते हैं कि कुछ ही महीनों में करीब 1.8 मिलियन डॉलर (₹15–16 करोड़) झोंक दिए गए। सवाल सीधा है—जब पेशेवर कूटनीति मौजूद थी, तो राजनीतिक संपर्कों की इस महंगी शॉर्टकटबाज़ी की ज़रूरत क्यों पड़ी?

बैठकें, बैठकें और बस बैठकें—नतीजा सिफ़र

काम क्या था? अमेरिकी अफ़सरों से मीटिंग्स, व्यापार वार्ताओं पर “चर्चाएँ”, सोशल मीडिया की “मॉनिटरिंग और फ्लैगिंग”। यानी गतिविधियों की लंबी सूची—पर उपलब्धियों की शून्य रेखा। कोई बड़ा व्यापार समझौता नहीं, कोई निर्णायक रणनीतिक लाभ नहीं, टैरिफ राहत तो दूर—दबाव और बढ़ा। अगर यही “आउटकम” है, तो इसे कूटनीति कहना कूटनीति का अपमान है।

पैसा गया, फायदा नहीं—यह ‘फोटो-ऑप डिप्लोमैसी’ है

विश्लेषकों का आरोप है कि यह पूरी कवायद कैमरों के सामने दोस्ती दिखाने, हाई-प्रोफाइल हैंडशेक और सोशल मीडिया नैरेटिव गढ़ने तक सीमित रही। जमीनी हकीकत यह कि ट्रंप काल में भारत को व्यापारिक मोर्चे पर उलटे झटके लगे—कई क्षेत्रों में टैरिफ बढ़े, विवाद गहराए। करोड़ों खर्च कर अगर नतीजा सिर्फ़ तस्वीरें हों, तो यह नीति नहीं—प्रोपेगेंडा है।

सरकारी बचाव बनाम जनता के सवाल

सरकार कहती है—अमेरिका में लॉबिंग सामान्य प्रक्रिया है। सवाल यह नहीं कि लॉबिंग होती है या नहीं; सवाल यह है कि किस कीमत पर और किस परिणाम के लिए। जब खर्च पहाड़ जैसा और लाभ रेत जैसा हो, तो जवाबदेही किसकी? क्या विदेश नीति अब पेशेवर राजनयिक कौशल की बजाय राजनीतिक “कोर्टशिप” और कॉन्ट्रैक्ट-डिप्लोमैसी के भरोसे छोड़ दी गई है?

‘साम्राज्यवाद नहीं गया’—बस सूट-बूट पहन लिया

यह प्रकरण चीख-चीखकर याद दिलाता है कि साम्राज्यवाद किताबों में दफन नहीं हुआ—उसने बस आधुनिक पैकेजिंग अपना ली है। आज दबाव टैंकों से नहीं, टैरिफ, लॉबिंग और राजनीतिक पहुँच से बनता है। बड़े देश अपनी शर्तें मनवाते हैं, और छोटे-आत्मविश्वास वाले फैसले उन्हें रास्ता दे देते हैं। सवाल यह है—क्या भारत ने अपनी संप्रभु कूटनीति को महंगी लॉबिंग के आगे गिरवी रख दिया?

जवाबदेही तय हो

मोदी–ट्रंप रिश्तों की चमक के पीछे छिपी यह कहानी साफ़ कहती है—करोड़ों खर्च, शून्य लाभ। यह केवल नीति की असफलता नहीं, जवाबदेही की परीक्षा है। जनता को जानने का हक़ है कि उनके पैसों से किसे, क्यों और किस परिणाम के लिए भुगतान हुआ। वरना इतिहास इसे कूटनीति नहीं—महंगी भूल के नाम से याद रखेगा।

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