मुफ्त की राजनीति का महोत्सव, आर्थिक अनुशासन का जनाज़ा
महाराष्ट्र सरकार द्वारा शुरू की गई विवादास्पद ‘लड़की बहिन योजना’, जिसके तहत राज्य की महिलाओं को हर महीने ₹1500 दिए जा रहे हैं, ने भारतीय राजनीति में एक नया नैरेटिव (आख्यान) तो स्थापित कर दिया है, लेकिन साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा और अप्रत्याशित संकट भी खोल दिया है। यह कदम ऊपरी तौर पर महिला सशक्तिकरण का प्रतीक और एक प्रगतिशील सामाजिक पहल लग सकता है, लेकिन हकीकत में यह राजकोषीय जिम्मेदारी पर एक सीधा और गंभीर हमला है।
इस योजना की वास्तविक मार तब सामने आई जब राज्य के वरिष्ठ मंत्री छगन भुजबल ने खुद सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि इस योजना की वजह से बाकी विभागों की जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसे नहीं बच रहे हैं। यह स्वीकारोक्ति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सरकार अब “तत्काल राजनीतिक लाभ” और “दीर्घकालिक विकास कार्यों” के बीच एक सीधा और विनाशकारी टकराव झेल रही है, जहाँ चुनाव जीतने की तात्कालिक आवश्यकता ने वित्तीय विवेक को ताक पर रख दिया है।
हर राज्य में ‘मुफ्त’ की होड़: दिवालियेपन की ओर बढ़ती राज्य अर्थव्यवस्थाएं
‘मुफ्त’ बांटने की यह राजनीतिक होड़ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लगभग पूरे देश में एक संक्रामक बीमारी की तरह फैल चुकी है। हाल ही में बिहार में भी लगभग 75 लाख महिलाओं के खातों में नकद राशि ट्रांसफर की गई। राजनीतिक दृष्टि से ऐसे कदम मास्टरस्ट्रोक कहे जा सकते हैं क्योंकि ये सीधे वोट बैंक को साधते हैं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से यह राज्यों के दिवालियेपन की ओर तेजी से बढ़ने का स्पष्ट संकेत है।
देश के लगभग हर राज्य में, विशेषकर चुनाव से पहले, “रेवड़ी संस्कृति” अपने चरम पर हावी होती जा रही है, जहाँ स्कूटी, गैस सिलेंडर, लैपटॉप, और मुफ्त बिजली जैसी हर चीज़ को अल्पकालिक राजनीतिक निवेश मान लिया गया है। लेकिन असली और सबसे बुनियादी सवाल यह है कि जब राज्यों के पास पहले से ही राजस्व का इतना बड़ा संकट है और वे कर्ज़ में डूबे हैं, तो इन विशालकाय योजनाओं के लिए यह पैसा आएगा कहाँ से? विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज़ लेकर वोट बाँटना और मुफ्त का वितरण करना किसी भी अर्थव्यवस्था की मृत्यु का पहला और सबसे निर्णायक चरण होता है।
राजकोषीय संतुलन की गिरती दीवारें और राजनीतिक सोच का पतन
भारत के अधिकांश राज्यों की राजकोषीय स्थिति चिंताजनक से भी बदतर हो चुकी है, जहाँ उनका राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 4 प्रतिशत से ज़्यादा हो चुका है। कई राज्यों का संचित कर्ज़ अब उनकी वार्षिक आय से भी अधिक है, जो उन्हें वित्तीय खाई की तरफ धकेल रहा है। ऐसे में, जब महाराष्ट्र जैसे आर्थिक रूप से मजबूत राज्य के वित्त विभाग से जुड़े मंत्री खुद यह कहते हैं कि “बाक़ी विभागों के लिए पैसे नहीं बचे,” तो यह केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय वित्तीय स्वास्थ्य की गंभीरता को दर्शाता है।
यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह उस विकृत राजनीतिक सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें “वोट पाना” अब “सतत विकास करना” से कई गुना ज़्यादा ज़रूरी और एकमात्र लक्ष्य बन गया है। इस राजनीतिक प्राथमिकता ने दीर्घकालिक आर्थिक अनुशासन को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है, जिससे भविष्य में राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता और स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी।
विकास नहीं, वितरण से चलती सरकारें: आत्मनिर्भरता पर सीधा हमला
महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा निसंदेह किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र के लिए अत्यंत ज़रूरी हैं, लेकिन इन उद्देश्यों को प्राप्त करने का सही रास्ता उत्पादन (Production) और रोजगार (Employment) आधारित नीतियों से होकर गुजरता है, न कि मुफ्त वितरण से। हर महीने नकद पैसा बाँटने से न तो नागरिकों में आत्मनिर्भरता की भावना आती है, न ही यह किसी भी प्रकार का दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित करता है।
यह एक ऐसा मीठा ज़हर है जो कुछ समय के लिए राजनीतिक संतुष्टि देता है, लेकिन समाज को आर्थिक रूप से पंगु बना देता है। अगर यही विनाशकारी मॉडल भारत के राज्यों में जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में राज्यों को अपने कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और लिए गए कर्ज़ की अदायगी तक के लिए केंद्र सरकार के दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे, जिससे राज्यों की स्वायत्तता और संघवाद की मूल भावना कमज़ोर होगी।
जनता को जागरूक होना होगा: वोट की कीमत और आर्थिक समझदारी
चूंकि राजनीति ने “मुफ्तखोरी” को अपनी स्थायी और सबसे प्रभावी रणनीति बना लिया है, इसलिए अब देश की जनता को ही अपनी “आर्थिक समझदारी” को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा। यह समय है जब मतदाताओं को तत्काल लाभ के लालच से ऊपर उठकर दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देनी होगी। वोट सिर्फ उस सरकार को मिलना चाहिए जो रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सार्वभौमिक स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखे, न कि केवल कैश ट्रांसफर के क्षणिक लालच पर आधारित हो। यदि नागरिक इस मुफ्तखोरी की संस्कृति को अस्वीकार नहीं करते हैं, तो वे न केवल अपने वर्तमान, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी खतरे में डाल देंगे।
मुफ्त की राजनीति और कर्ज़ के बोझ तले दबने वाली पीढ़ियां
‘लड़की बहिन योजना’ जैसी घोषणाएं भले ही सत्ताधारी दलों को अल्पकाल में चुनाव जितवा दें, लेकिन दीर्घकाल में ये निश्चित रूप से राज्य की आर्थिक जड़ों को खोखला कर देंगी। यह एक ऐसा वित्तीय आतंकवाद है जो शांत तरीके से राज्य की समृद्धि को नष्ट कर देता है। जैसा कि शाहिद सईद ने चेतावनी दी है: “अगर राजनीति मुफ्त के भरोसे चलेगी, तो आने वाली पीढ़ियां कर्ज़ के बोझ तले दम तोड़ेंगी।” भारत को इस रेवड़ी संस्कृति से बाहर निकलने और आर्थिक अनुशासन को फिर से स्थापित करने की सख्त आवश्यकता है, ताकि हमारा लोकतंत्र चुनावी लाभ के बजाय संवैधानिक विकास के सिद्धांतों पर चल सके।




