अंतरराष्ट्रीय | युवा राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | 21 अप्रैल 2026
दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नई हलचल दिख रही है—Gen Z यानी नई पीढ़ी का उभार। नेपाल और बांग्लादेश में युवाओं ने सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसा माहौल बनाया कि सरकारों को झुकना पड़ा। लेकिन इस आंधी को हवा किसने दी, कौन इससे आगे निकला और कौन पीछे रह गया—यह समझना बेहद जरूरी है। सबसे पहले बात करते हैं कि इस “आंधी” की शुरुआत कैसे हुई। दरअसल, यह अचानक नहीं था। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और नेताओं की लाइफस्टाइल से बढ़ती दूरी—इन सबने युवाओं के अंदर गुस्सा जमा कर दिया था। मोबाइल और इंटरनेट ने इस गुस्से को आवाज दी। इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म आंदोलन का हथियार बन गए। छोटे-छोटे मुद्दे देखते ही देखते बड़े जन आंदोलन में बदल गए।
नेपाल में यह आंधी सबसे ज्यादा असरदार साबित हुई। वहां युवाओं ने सिर्फ विरोध नहीं किया, बल्कि जल्दी ही खुद को संगठित कर लिया। उन्होंने अपने मुद्दे तय किए, नेतृत्व तैयार किया और चुनावी मैदान में उतर गए। नतीजा यह हुआ कि पुराने राजनीतिक चेहरे कमजोर पड़े और नए युवा नेता उभरकर सामने आए। यह आंदोलन इसलिए सफल हुआ क्योंकि इसमें दिशा, योजना और लक्ष्य साफ था।
दूसरी तरफ बांग्लादेश में भी युवाओं ने जबरदस्त आंदोलन किया। सड़कों पर लाखों लोग उतरे, सत्ता बदली, लेकिन इसके बाद कहानी बदल गई। वहां आंदोलन के बाद नेतृत्व का संकट पैदा हो गया। कोई मजबूत चेहरा सामने नहीं आया जो आंदोलन को राजनीतिक ताकत में बदल पाता। यही वजह रही कि जो ऊर्जा सड़कों पर दिखी, वह सत्ता तक नहीं पहुंच सकी।
अगर साफ शब्दों में कहें, तो नेपाल “सफल मॉडल” बनकर उभरा, जबकि बांग्लादेश “अधूरा आंदोलन” बनकर रह गया। सफलता और असफलता के बीच सबसे बड़ा फर्क यही था—संगठन और नेतृत्व।
अब सवाल है कि इस पूरी आंधी को हवा किसने दी? इसका जवाब सिर्फ एक नहीं है। सोशल मीडिया ने मंच दिया, आर्थिक समस्याओं ने गुस्सा पैदा किया, और राजनीतिक सिस्टम से निराशा ने इसे ताकत दी। लेकिन असली ताकत खुद युवा ही थे, जिन्होंने डर छोड़कर खुलकर अपनी बात रखी।
अब आगे क्या?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ शुरुआत है। आने वाले समय में Gen Z राजनीति का बड़ा चेहरा बनने वाली है। भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में युवा अब सिर्फ वोटर नहीं रहेंगे, बल्कि नीति बनाने और सत्ता तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
लेकिन एक चेतावनी भी है—अगर यह ऊर्जा सही दिशा में नहीं गई, तो यह सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड बनकर रह जाएगी। और अगर इसे संगठन, विचार और नेतृत्व मिल गया, तो यह आने वाले वर्षों में पूरी राजनीति की तस्वीर बदल सकती है। आखिर में बात साफ है—Gen Z की आंधी खुद नहीं चलती, इसे मुद्दे हवा देते हैं, और दिशा ही इसे मंजिल तक पहुंचाती है।




