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इथेनॉल की दौड़: क्या भारत सही दिशा में बढ़ रहा है या बड़ी गलती कर रहा है?

ओपिनियन | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 जुलाई 2026

भारत में इथेनॉल को लेकर जिस तेजी से फैसले लिए जा रहे हैं, उसने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआत पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से हुई थी, लेकिन अब सरकार विमानन क्षेत्र तक इसके इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रही है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और प्रदूषण भी कम होगा। सुनने में यह योजना आकर्षक लगती है, लेकिन किसी भी बड़े बदलाव की सफलता केवल इरादों से नहीं, बल्कि उसकी तैयारी और वैज्ञानिक आधार से तय होती है।

सबसे पहले इथेनॉल की क्षमता को समझना जरूरी है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 से 33 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसका सीधा असर वाहन के माइलेज पर पड़ता है। यानी उतनी ही दूरी तय करने के लिए ज्यादा ईंधन की जरूरत होगी। अगर उपभोक्ता को कीमत भी लगभग पेट्रोल जितनी चुकानी पड़े और माइलेज भी कम मिले, तो उसके लिए इस बदलाव का फायदा कहां है? यह सवाल आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

एक चिंता देश के करोड़ों वाहन मालिकों की भी है। भारत की सड़कों पर आज भी बड़ी संख्या में ऐसे वाहन चल रहे हैं जिन्हें E20 जैसे मिश्रित ईंधन को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया था। कई तकनीकी रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि लंबे समय तक ऐसे ईंधन का उपयोग पुराने वाहनों के रबर के पुर्जों, फ्यूल पाइप, इंजेक्टर और धातु के हिस्सों पर असर डाल सकता है। इसके अलावा इथेनॉल की एक विशेषता यह भी है कि वह वातावरण की नमी को तेजी से सोखता है। यदि वाहन लंबे समय तक खड़ा रहे तो ईंधन में पानी अलग होकर इंजन को नुकसान पहुंचा सकता है।

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ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि क्या इतने बड़े बदलाव से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक परीक्षण किए गए हैं? यदि नहीं, तो करोड़ों वाहन मालिकों को एक ऐसे प्रयोग का हिस्सा क्यों बनाया जाए, जिसके दीर्घकालिक परिणाम अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं? किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले पारदर्शी और स्वतंत्र परीक्षण होना जरूरी है। इससे लोगों का भरोसा भी बढ़ता है और नीति भी मजबूत होती है।

इथेनॉल का असर केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध खेती और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ता है। आज मक्का, गन्ना और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल तेजी से इथेनॉल उत्पादन में बढ़ रहा है। इससे किसानों को इन फसलों की ओर आकर्षण स्वाभाविक है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। यदि दालों और तिलहन की खेती कम होगी तो देश को खाद्य तेल और दूसरी जरूरी कृषि उपज के लिए आयात पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है। इसका असर आम आदमी की रसोई तक पहुंचेगा।

इसके साथ ही पशुपालन क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है। मक्का की बढ़ती मांग से पशुओं के चारे की कीमत बढ़ती है। इसका असर डेयरी और पोल्ट्री उद्योग पर पड़ता है। आखिरकार इसकी कीमत भी उपभोक्ता को ही चुकानी पड़ती है।

भारत पहले ही पानी की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। गन्ना जैसी फसलें अत्यधिक पानी मांगती हैं। यदि ऐसी फसलों का उत्पादन केवल इथेनॉल के लिए बढ़ाया जाएगा तो भूजल पर दबाव और बढ़ेगा। ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि कहीं ऊर्जा सुरक्षा की कोशिश में हम जल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को कमजोर तो नहीं कर रहे।

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इथेनॉल के समर्थन में अक्सर ब्राज़ील का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन ब्राज़ील और भारत की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। ब्राज़ील ने करीब पांच दशक तक लगातार तैयारी की। वहां पहले वाहन तकनीक विकसित हुई, फिर ईंधन वितरण व्यवस्था बदली और उसके बाद लोगों को विकल्प मिले। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि वहां बदलाव धीरे-धीरे हुआ। भारत में यह प्रक्रिया कहीं अधिक तेज दिखाई देती है। इसलिए दोनों देशों की तुलना करते समय उनकी परिस्थितियों और तैयारी के स्तर को भी समझना जरूरी है।

भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश को किसी एक ईंधन पर निर्भर रहने की बजाय कई विकल्पों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा का मतलब केवल इथेनॉल नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन हाइड्रोजन, बायोगैस, टिकाऊ विमानन ईंधन और कृषि अवशेषों या नगर निगम के कचरे से बनने वाले उन्नत जैव ईंधन—इन सभी को साथ लेकर चलने वाली नीति ही भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित मानी जा सकती है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि भविष्य के जैव ईंधन का आधार खाद्यान्न नहीं, बल्कि पराली, कृषि अवशेष, नगर निगम का कचरा और अन्य जैविक अपशिष्ट होना चाहिए। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा बल्कि खाद्यान्न उत्पादन और किसानों की फसल व्यवस्था पर भी अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा।

हाल के वर्षों में दुनिया ने देखा है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्ध की स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति कितनी तेजी से प्रभावित हो सकती है। ऐसे अनुभव बताते हैं कि किसी एक विकल्प पर अत्यधिक भरोसा करना समझदारी नहीं है। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति की जरूरत है जिसमें कई ईंधन एक-दूसरे के पूरक बनें, प्रतिस्पर्धी नहीं।

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इथेनॉल निश्चित रूप से ऊर्जा के विकल्पों में एक महत्वपूर्ण स्थान रख सकता है। लेकिन इसे हर समस्या का समाधान मान लेना उचित नहीं होगा। किसी भी नीति की सफलता उसके वैज्ञानिक आधार, आर्थिक व्यवहार्यता और आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव से तय होती है। इसलिए इथेनॉल को लेकर जल्दबाजी की बजाय व्यापक अध्ययन, स्वतंत्र परीक्षण और खुली सार्वजनिक चर्चा अधिक जरूरी है।

ऊर्जा सुरक्षा केवल विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने का नाम नहीं है। असली ऊर्जा सुरक्षा वही होगी, जिसमें देश के किसानों का हित सुरक्षित रहे, उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, पानी और खाद्यान्न पर संकट न बढ़े और पर्यावरण को भी वास्तविक लाभ मिले। भारत को भविष्य की ऊर्जा नीति इसी संतुलित सोच के साथ बनानी होगी।

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