अखलाक अहमद | नई दिल्ली, 23 नवंबर 2025
बड़ा संरचनात्मक बदलाव
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में अब तक का सबसे बड़ा ढांचा परिवर्तन होने जा रहा है। संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में सरकार उच्च शिक्षा आयोग विधेयक 2025 पेश करेगी, जिसके तहत देश के तीन सबसे महत्वपूर्ण नियामक संस्थान—UGC, AICTE और NCTE—को पूरी तरह भंग किया जाएगा। इनकी जगह एक नया शक्तिशाली और एकल संस्था उच्च शिक्षा आयोग (HECI) बनाई जाएगी। सरकार का दावा है कि यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों को पूरा करेगा और भारतीय उच्च शिक्षा को अधिक पारदर्शी, आधुनिक और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा। वहीं आलोचक इसे अत्यधिक केंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया खतरनाक कदम मान रहे हैं।
ग्रेडेड स्वायत्तता और अधिक स्वतंत्रता का दावा
सरकारी सूत्रों के अनुसार, नया आयोग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ग्रेडेड स्वायत्तता प्रदान करेगा। यानी जिन संस्थानों का प्रदर्शन बेहतर होगा, उन्हें कोर्स डिजाइन, फीस निर्धारण, फैकल्टी चयन और प्रवेश प्रक्रिया में अधिक अधिकार दिए जाएंगे। मान्यता और एक्रेडिटेशन की प्रक्रिया भी पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी होगी। सरकार का मानना है कि इससे संस्थान नवाचार कर सकेंगे और वैश्विक स्तर के कार्यक्रम शुरू करने में सक्षम होंगे। चार स्वतंत्र वर्टिकल—नियमन, एक्रेडिटेशन, फंडिंग और शैक्षणिक मानक—इस नई व्यवस्था को सरल बनाएंगे और मंजूरी प्रक्रिया को तेज करेंगे।
समर्थकों के तर्क: तेज सुधार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
समर्थकों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कई नियामक संस्थानों के कारण भ्रम, ओवरलैपिंग नियम और देरी की समस्या बनी रहती है। नया मॉडल “लाइट बट टाइट रेगुलेशन” पर आधारित होगा, जिसमें अच्छे संस्थानों पर कम नियंत्रण और कमजोर संस्थानों पर अधिक जवाबदेही होगी। यह मॉडल ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की व्यवस्था से प्रेरित बताया जा रहा है। NEP के प्रमुख सुधार—मल्टीपल एंट्री-एग्जिट, चार वर्षीय डिग्री, स्किल-बेस्ड शिक्षा और बहु-विषयी अध्ययन—को लागू करने में HECI अहम भूमिका निभाएगा। सरकार नेशनल एजुकेशन इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म भी शुरू करने जा रही है, जिससे डेटा आधारित नीति निर्माण और फंडिंग वितरण आसान होगा।
छात्रों को संभावित लाभ और नए अवसर
समर्थकों का दावा है कि इस विधेयक से छात्रों को सीधा लाभ मिलेगा। ऑनलाइन मान्यता प्रक्रिया से प्रवेश और डिग्री सत्यापन आसान होगा, और संस्थानों में पारदर्शिता बढ़ेगी। उच्च कौशल आधारित शिक्षा, लचीली डिग्री संरचना और बेहतर कोर्स विकल्पों के कारण लाखों युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिल सकते हैं। इसके साथ निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ने से नए संस्थान और रिसर्च सुविधाएं विकसित होने की उम्मीद है।
केंद्रीकरण का खतरा और राज्यों की भूमिका पर सवाल
हालांकि, आलोचकों की चिंताएँ गंभीर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि HECI में केंद्र सरकार का नियंत्रण बहुत अधिक होगा, जबकि राज्यों की भूमिका सीमित रहेगी। इससे संघीय ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विरोधियों का तर्क है कि यह व्यवस्था UGC का ही नया रूप बन सकती है, जिसमें नियंत्रण बढ़ेगा और स्वतंत्रता सीमित होगी। उनकी आलोचना का मुख्य बिंदु यह है कि बिल में फंडिंग को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जबकि उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी ही है।
असमानता बढ़ने का खतरा
विरोधियों का कहना है कि “ग्रेडेड स्वायत्तता” का वास्तविक लाभ केवल बड़े और संसाधन-संपन्न संस्थानों को मिलेगा। छोटे, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के कॉलेज और भी पीछे छूट जाएंगे। ग्रेडिंग सिस्टम में पूर्वाग्रह और संसाधनों की कमी इन संस्थानों की स्थिति और खराब कर सकती है। साथ ही यह आशंका भी है कि AICTE और NCTE जैसे विशेषज्ञ नियामकों के विलय से तकनीकी शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
अकादमिक स्वतंत्रता और विविधता पर असर
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि एकल नियामक संरचना अकादमिक विविधता को खत्म कर सकती है। सख्त ऑडिट और पारदर्शिता के नाम पर संस्थानों के दैनिक कामकाज में हस्तक्षेप बढ़ सकता है, जिससे रचनात्मकता और प्रयोगधर्मिता प्रभावित होगी। सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है, जहाँ कई लोग इसे “अधिक सरकारी नियंत्रण” बताकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे निजी विश्वविद्यालय फीस बढ़ा सकते हैं और छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
अंतिम मूल्यांकन: अवसर या जोखिम?
अंततः, उच्च शिक्षा आयोग विधेयक 2025 को दोधारी तलवार माना जा रहा है। एक तरफ यह उच्च शिक्षा को आधुनिक, कुशल और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने का अवसर देता है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीकरण, असमानता और नियंत्रण के जोखिम भी पैदा करता है। संसद में होने वाली बहस यह तय करेगी कि यह विधेयक भारत की शिक्षा प्रणाली को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा या विवादों का नया दौर शुरू करेगा। विशेषज्ञों की राय है कि यदि इस विधेयक में राज्य सरकारों की मजबूत भूमिका, फंडिंग के स्पष्ट प्रावधान और विविध शिक्षा आवश्यकताओं को शामिल किया गया, तभी यह वास्तविक सफलता साबित हो सकेगा। अब देश की नजरें शीतकालीन सत्र पर हैं, क्योंकि वहीं से तय होगा कि भारत की शिक्षा प्रणाली नए युग में प्रवेश करेगी या पुरानी चुनौतियों से जूझती रहेगी।




