Home » National » ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के वादों का हिसाब: ज़मीन पर हकीकत, काग़ज़ पर नारे

‘मोदी है तो मुमकिन है’ के वादों का हिसाब: ज़मीन पर हकीकत, काग़ज़ पर नारे

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

एबीसी डेस्क 18 दिसंबर 2025

पिछले एक दशक में देश ने सिर्फ़ योजनाएँ नहीं देखीं, बल्कि नारों की एक पूरी संस्कृति देखी। हर चुनाव, हर मंच और हर विज्ञापन में बड़े-बड़े दावे किए गए—ऐसे दावे, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी से जुड़े थे। “मोदी है तो मुमकिन है” ऐसा ही एक नारा बना, जिसने लोगों को भरोसा दिलाया कि अब फैसले तेज़ होंगे, संस्थाएँ मज़बूत होंगी और विकास की रफ्तार ज़मीन पर दिखेगी। लेकिन आज जब लोग अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों के साथ पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उन्हें यह सवाल परेशान करता है कि क्या सच में सब कुछ मुमकिन हुआ, या फिर बहुत कुछ सिर्फ़ शब्दों और पोस्टरों तक सीमित रह गया।

सरकार के आलोचक यह भी कहते हैं कि इस दौर में सिर्फ़ योजनाएँ ही नहीं बदलीं, बल्कि संस्थाओं के साथ सरकार का रवैया भी बदला। संविधान की भावना से छेड़छाड़ के आरोप लगते रहे—कभी अध्यादेशों के ज़रिये, कभी कानूनों की जल्दबाज़ी में पासिंग के ज़रिये। RBI जैसी स्वायत्त संस्था पर दबाव की बातें सामने आईं, गवर्नरों के इस्तीफ़े चर्चा में रहे। CBI और दूसरी जांच एजेंसियों पर सत्ता के हिसाब से इस्तेमाल के आरोप लगे, जिससे जनता के मन में यह सवाल बैठ गया कि क्या संस्थाएँ अब भी स्वतंत्र हैं या फिर सत्ता के इशारों पर चल रही हैं।

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच ‘मेक इन इंडिया’ को देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सपना बताया गया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह रही कि छोटे और मझोले उद्योग संघर्ष करते रहे, कई फैक्ट्रियाँ बंद हुईं और आयात पर निर्भरता कई क्षेत्रों में कम होने के बजाय बढ़ी। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भाषणों में सख़्त संदेश दिए गए, लेकिन आए दिन की घटनाएँ बताती हैं कि डर और असुरक्षा आज भी महिलाओं की ज़िंदगी का हिस्सा है। ‘स्वच्छ भारत’ ने शौचालयों की संख्या ज़रूर बढ़ाई, पर सफ़ाई, सीवेज और कचरा प्रबंधन जैसे बुनियादी सवाल आज भी जस के तस खड़े हैं।

‘नमामि गंगे’ के नाम पर गंगा को निर्मल और अविरल बनाने का वादा किया गया था। अरबों रुपये खर्च हुए, लेकिन कई जगहों पर नदी की हालत में आम लोगों को कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आया। नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक वार बताया गया, मगर बाद में आए सरकारी आंकड़ों ने खुद इस दावे को कमजोर कर दिया। लगभग सारा पैसा बैंकों में लौट आया, जबकि आम आदमी ने लाइनें, नकदी संकट, नौकरी जाने और छोटे कारोबार बंद होने की पीड़ा झेली। इसी तरह प्रदूषण नियंत्रण के मोर्चे पर भी हालात डराने वाले बने रहे—दिल्ली-NCR और दूसरे बड़े शहरों में ज़हरीली हवा अब सामान्य सच्चाई बन चुकी है।

सरकारी संपत्तियों और रक्षा सौदों को लेकर भी सवाल उठे। आरोप लगे कि राष्ट्रीय संपत्तियाँ निजी हाथों में सौंपी जा रही हैं और रक्षा सौदों की फाइलें पारदर्शिता से दूर हैं। विकास दर और आंकड़ों को लेकर भी बहस तेज़ हुई—कभी GDP गणना के तरीकों पर सवाल उठे, कभी गरीबी और महंगाई के आंकड़ों पर। आम आदमी को जो महसूस हुआ, वह यह कि महंगाई कम होने के दावों के बावजूद रसोई का खर्च बढ़ता गया और आमदनी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी।

100 स्मार्ट सिटी का सपना दिखाया गया था, लेकिन ज़्यादातर शहर आज भी अधूरे प्रोजेक्ट्स, टूटी सड़कों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। भ्रष्टाचार खत्म करने के नारे गूंजते रहे, पर घोटालों और आरोपों की खबरें थमी नहीं। विदेशों से काला धन लाने का वादा एक समय लोगों के लिए उम्मीद बना था, लेकिन न तो वह धन लौटा और न ही आम आदमी की ज़िंदगी में कोई ठोस बदलाव दिखा। बुलेट ट्रेन 2023 तक चलने की बात थी, मगर परियोजना आज भी अधर में है।

रुपया 40 प्रति डॉलर तक मज़बूत करने का वादा किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि रुपया लगातार दबाव में रहा। हर साल दो करोड़ नौकरियों का दावा युवाओं के लिए सपने जैसा था, मगर बेरोज़गारी आज भी एक कड़वी सच्चाई बनी हुई है। किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन किसान आज भी कर्ज़, लागत और बाज़ार की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। हर खाते में 15 लाख रुपये आने का वादा अब खुद एक राजनीतिक व्यंग्य बन चुका है, और 2022 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी समय के साथ अधूरा सपना साबित हुआ।

आख़िरकार सवाल किसी एक योजना या एक आंकड़े का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जो आम आदमी ने इन नारों पर किया था। लोकतंत्र में सरकारें वादे करती हैं, जनता भरोसा करती है और समय आने पर हिसाब मांगती है। “मोदी है तो मुमकिन है” एक ताकतवर नारा था, लेकिन जब ज़मीन पर नतीजे उम्मीदों से मेल नहीं खाते, तो वही नारा सवाल बन जाता है। शायद अब देश को नए जुमलों से ज़्यादा ईमानदार जवाबों, मज़बूत संस्थाओं और ठोस नतीजों की ज़रूरत है—क्योंकि उम्मीदें भाषणों से नहीं, सच्चाई से ज़िंदा रहती हैं।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments