नई दिल्ली
29 जुलाई 2025
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए आतंकियों के पास से मिले सामान ने न केवल भारत को झकझोर कर रख दिया, बल्कि एक बार फिर पाकिस्तान की आतंक को प्रायोजित करने की रणनीति को बेनकाब कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुठभेड़ पर संसद में जो तथ्य रखे, उससे यह साफ हो गया कि आतंकवाद आज भी सीमा पार से ही संचालित हो रहा है। लोकसभा में अपने विस्तृत वक्तव्य में शाह ने न केवल पहलगाम हमले का पाकिस्तान कनेक्शन उजागर किया, बल्कि कांग्रेस की कश्मीर नीति और बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी तीखा हमला किया।
अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि पहलगाम में मारे गए तीन आतंकियों के पास से पाकिस्तान में बना हुआ राशन, दवाइयां, चॉकलेट्स, सैन्य बैग, रेडियो उपकरण और यहां तक कि पाकिस्तानी वोटर आईडी नंबर बरामद हुए हैं। इनमें से एक वोटर ID पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक नागरिक के नाम पर था। चॉकलेट्स पर उर्दू में ‘मेड इन पाकिस्तान’ छपा था। मेडिकल किट्स पर कराची की कंपनियों के नाम और बैच नंबर दर्ज थे। यह महज़ सामान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नापाक भूमिका के दस्तावेज़ी सबूत हैं।
शाह ने जोर देकर कहा कि ये आतंकी स्थानीय नहीं थे, बल्कि पूरी तरह प्रशिक्षित पाकिस्तानी नागरिक थे, जिन्हें अमरनाथ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों को निशाना बनाने और घाटी में तनाव फैलाने के मकसद से भेजा गया था। उनके पास मिले GPS उपकरणों में अमरनाथ यात्रा मार्ग, सेना की चौकियों और पुलिस थानों की सटीक लोकेशन फीड थी। इससे यह संकेत मिलता है कि वे किसी बड़ी आतंकी साजिश को अंजाम देने आए थे, जो समय रहते भारतीय सुरक्षाबलों ने विफल कर दी।
यह मुठभेड़ सुरक्षाबलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस के साझा ऑपरेशन का नतीजा थी, जिसमें दो घंटे की भिड़ंत के बाद तीनों आतंकी ढेर कर दिए गए। हालांकि एक सुरक्षाकर्मी घायल हुआ, लेकिन उसकी हालत अब स्थिर है। इस कार्रवाई के बाद NIA और अन्य जांच एजेंसियों ने 1,000 से अधिक लोगों से पूछताछ की है। कुछ संदिग्ध गिरफ्तार भी किए गए हैं, जिनसे पूछताछ जारी है।
लोकसभा में शाह का भाषण केवल पहलगाम तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर पंडित नेहरू ने 1947-48 में सेना को रोकने के बजाय उन्हें कार्रवाई करने दी होती, तो आज PoK भारत का हिस्सा होता। उन्होंने कांग्रेस की कश्मीर नीति को “राष्ट्रविरोधी और विभाजनकारी” बताते हुए कहा कि आज की आतंकवाद की जड़ें उस समय की राजनीतिक गलतियों में छिपी हैं।
इसके साथ ही उन्होंने 2008 के बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी हमला बोला और कहा कि “जब एक दुर्दांत आतंकी मारा गया था, तब कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी की आंखों में आंसू क्यों थे?” शाह ने तुष्टिकरण की राजनीति को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इससे न केवल सुरक्षाबलों का मनोबल टूटा, बल्कि आतंकवाद को परोक्ष समर्थन भी मिला।
शाह के इन बयानों के दौरान संसद में विपक्ष ने हंगामा किया, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों का राजनीतिकरण कर रही है। लेकिन सत्ता पक्ष ने जवाब में कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और आतंक के प्रति “जीरो टॉलरेंस” नीति से कोई समझौता नहीं होगा, चाहे विपक्ष को कितना भी असहज क्यों न लगे।
इस पूरी बहस और मुठभेड़ के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान एक बार फिर पुराने रास्ते पर चल पड़ा है — आतंक को सीमा पार से प्रायोजित करना। लेकिन भारत अब 1990 के दशक वाला भारत नहीं है। अमित शाह ने संसद में साफ संदेश दिया कि “अब भारत सिर्फ चेतावनी नहीं देता, कार्रवाई करता है।” भारत अब हर आतंकी साजिश को जड़ से खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहा है, और यही वजह है कि पहलगाम में बड़ा हमला टल गया।
संसद में शाह के संबोधन ने एक साथ कई संदेश दिए — आतंकवाद के प्रति सरकार का सख्त रुख, कांग्रेस की गलतियों की ऐतिहासिक पुनरावलोकन, और पाकिस्तान की भूमिका का अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर होना। पहलगाम ऑपरेशन न केवल सैन्य सफलता थी, बल्कि यह एक कूटनीतिक और राजनीतिक संदेश भी था कि भारत अब हर मोर्चे पर तैयार है — चाहे वह सीमा हो, संसद हो या अंतरराष्ट्रीय समुदाय।




